मैं 'प्राइमरी स्कूल' हूँ

खेतों-खलिहानों में खड़ा निःशब्द सा,
किलकारियों के अभाव में स्तब्ध सा,
शिक्षा के बागानों का एक फूल हूँ,
हाँ! मैं प्राइमरी स्कूल हूँ..

जर्ज़र सा अकेला खुद को पा रहा,
फ़िर भी हर पल ज्ञान की अलख जगा रहा,
ग़रीबी और अशिक्षा के लिए शूल हूँ,
हाँ! मैं प्राइमरी स्कूल हूँ..

मुझमें दिखते गड्ढे, टूटे फर्श हैं,
आशाएँ मुझसे ये रखते अर्श हैं,
शासन व्यवस्थाओं की लगता भूल हूँ,
हाँ! मैं प्राइमरी स्कूल हूँ..

कहता 'क' से कबूतर और 'ख' से खरगोश,
बारहखड़ी को गा-गाकर भरता हूँ जोश,
मैं ही ज्ञान का शीर्ष, मैं ही मूल हूँ,
हाँ! मैं प्राइमरी स्कूल हूँ..

मेरे हैं सब बच्चे और मैं हूँ सबका,
जो भी कहता अपना, हाँ मैं हूँ उसका,
सरस्वती माँ के चरणों की धूल हूँ,
हाँ! मैं प्राइमरी स्कूल हूँ..

रचयिता
सौरभ शुक्ला 'साहिल',
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय पिपरिया,
विकास क्षेत्र-भोजीपुरा, 
जनपद-बरेली।

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