धरती की पुकार

हरियाली की चादर ओढ़े,
अपनी वसुधा मन को मोहे।
   झूम- झूम कर वृक्ष ये कहते,
    उर्वी में जल को हम संचित  करते।

धरा की अब यही पुकार,
प्लास्टिक व रासायनिक खाद है बेकार।
बढ़ता ताप, CFC, N02 व C02 गैस के प्रकार,
ग्लेशियर पिघलने के हैं जिम्मेदार।

हे मानव! अब संकल्प धरो,
फसल अवशेष को जलाना बंद करो।
पृथ्वी पर बनी रहे हरियाली,
मिल सब बचायें ओजोन की जाली।

रत्नगर्भा का ना हो दोहन,
करें संचित हर संसाधन।
कचरे का हम करें निस्तारण,
  4R   का हो अनुसरण।

हरितिमा बनी रही ये धरती,
जमीन को ना रखो तुम परती।
जैव उर्वरक अवनी को देते शक्ति।।
फसल चक्र माँगें ये क्षिती

जीवों व वनस्पतियों की लुप्त ना हो प्रजाति,
रेड डेटा बुक में ना दर्ज हो उपस्थिति।
सभी जाति-प्रजाति को करके संरक्षित,
धरणी संग सब जन-धन हो हर्षित।।

रचयिता
प्रियंशा मौर्य,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय चिलार,
विकास क्षेत्र-देवकली,
जनपद-गाजीपुर।

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