पृथ्वी का मनुष्यों को संदेश

 चहुँओर मचा है हाहाकार, फिर भी मानव तू क्यों बहरा है?

क्यों कहूँ तुझे मैं शिक्षित अब, जब अज्ञान तुझ ही में गहरा है।


पृथ्वी का मनुष्यों को संदेश


देखो मानव, ये है तुम्हारी तथाकथित मानवता का प्रसार।


तुम्हारी उपभोगवादी संस्कृति ने आज क्या हालत कर दी है मेरी? तुम्हें यह स्वीकार करना चाहिए कि सारे संसाधन तुम्हारी जागीरदारी नहीं है और न ही यह तुम्हें विरासत में मिली है। ये तुम्हें ऋण-स्वरूप प्राप्त एक अदायगी मात्र है जिसे तुम्हें अपने बच्चों को ब्याज सहित लौटाना है।


वैसे तो तुम वर्तमान को भूलकर हमेशा भविष्य के लिए कल्पनाएँ किए जाने में ही व्यस्त पाए जाते हो जिसके लिए तुम अपनी मृत्यु का बीमा तक कराते हो। लेकिन क्या तुमने कभी ये सोचा है कि जब मैं ही नहीं रहूँगी तो क्या होगा तुम्हारा भविष्य और तुम्हारे बच्चों के भविष्य का?


अपने भोग की अभिलाषा में लिप्त तुम उनकी थाली में जो प्लास्टिक और कचरा परोस रहे हो क्या वे इसका पाचन कर सकेंगे? और क्या जैसी दुनिया में तुम उन्हें लाकर बधाई हो, बधाई हो, के नारे लगाते हो। इन नारों की गूंज तुम्हारे ही मुँह पर एक तमाचे की तरह नहीं पड़ती?


और उनसे भी पहले तुम। तुम क्यों नहीं देखते कि आज जिसे तुम अच्छी जीवन-शैली कहते हो वो किस बुनियाद पर खड़ी है? जिस भवन की बुनियाद में ही दीमक लगे हैं क्या वो तुम्हें छत दे पाएगी?


तुमने कभी सोचा है तुमने जो कुछ भी बुनियादी आवश्यकताओं के तौर पर मुझे और खुद को भी बताया था आज तुम्हारी हवस उससे कितना आगे निकल चुकी है? क्या है तुम्हारे पास आज ऐसा जिसे तुम शुद्ध या स्वच्छ कह सको?


हवा, पानी, मिट्टी सबमें घुला ये ज़हर।

यहाँ तक की तुम्हारी रगों में बहता रक्त भी अशुद्ध ही होगा; इसकी प्रबल संभावना है और उस पर भी तुम्हारी ये वीभत्स और घिनौनी मानसिक-प्रवंचनाओं का मायाजाल जिसमें तुम स्वयं उलझकर मरते हो, वो इन सबसे भी लाजवाब है।


हे मानव, सुनो! तुम्हारी लालची और स्वार्थी प्रवृत्ति ने अब मुझे कहीं का नहीं छोड़ा है। मेरे छोटे-छोटे बच्चे, सभी जीव-जंतु जो असहाय हैं वो बेचारे उस पाप के लिए कष्ट पा रहे हैं जो उन्होंने कभी किए ही नहीं और मैं नहीं समझ पा रही हूँ कि आखिर मेरी इतनी चेतावनियों जो कभी भूकंप, कभी तूफ़ान, कभी महामारी तो कभी बाढ़ या सूखा आदि का रूप लेकर आती हैं; के बाद भी तुम्हारी आँखें और बुद्धि कैसे ढकी रह सकती हैं?


और जलवायु परिवर्तन की मार तो तुम झेल ही रहे हो। आखिर कब तक तुम अपनी अंधी कामनाओं का विसर्जन नहीं करोगे? और कब तक बच सकोगे? या कौन है, जो तुम्हें बचा सकता है? मैंने तो तुम्हें ही उद्धारक बना कर भेजा था और देखो, तुमने आज कुछ भी ऐसा नहीं छोड़ा है जिसके विनष्ट होने में तुम्हारा हाथ न हो।


भले ही तुम स्वयं को शाकाहारी मान बैठे हो लेकिन तुम्हारे हाथ रंगे हैं बहुत-सी प्रजातियों के खून से जो तुम्हारी भोग की आग में जलकर हमेशा-हमेशा के लिए राख हो गयीं।


और क्या अब भी तुम ये कल्पना कर रहे हो कि मैं तुम्हें बचा सकूँगी? सुधरने का वक्त तो बहुत पहले निकल गया है तुम्हारा ये प्रकृति-प्रेमी बने रहने का ढोंग अब तुम्हें बचा नहीं सकता।


फिर भी प्रयास करो। तुम्हें अगर 'पृथ्वी बचाओ' की भाषा समझ नहीं आती तो मैं अब तुमसे कहती हूँ कि बचा सको तो अब स्वयं को बचाओ।


रचयिता

गरिमा सिंह चंदेल,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय चन्द्रवल किशनपुर,
विकास खण्ड-मैथा, 
जनपद-कानपुर देहात।




Comments

Total Pageviews