पथ की बाधा

जो कभी खिलते थे विद्यालय परिसर में मेरे‌,
पुलकित हर्षित उल्लास भरे।
मुरझा से गए घर के आँगन में,
मायूस हुए से कोने में।

अब तक तो उम्मीद में बैठे थे,
माह जुलाई आएगी,
स्वच्छंदमयी   दुनिया में,
नई रंग बिखेर जाएगी।

शिक्षण में नवनिर्माण के लिए,
हम उनको प्रेरित करते हैं
कोमल हाथों में फोन लिए,
मानों वह पंख पसारे, उड़ने की चाह में बैठे हैं।

उनको इतना मायूस देख,
मन मेरा भी विचलित हो जाता है।
मन करता है जकड़ दूँ इस निर्मम  काल को,
जो सबके पथ की बाधा है।

रचयिता
बिधु सिंह, 
एआरपी हिन्दी, 
विकास खण्ड-बिसरख,               
जनपद-गौतमबुद्धनगर।

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