शेखीबाज मक्खी

विषय - रिमझिम
कक्षा  - ३
पाठ  - शेखीबाज मक्खी
कविता-----"शेखीबाज मक्खी"

एक दिन जंगल का राजा करने लगा आराम,
भिन-भिन करती एक मक्खी ने कर दी नींद हराम।

उड़ती बैठती तंग करती वो शेर को खूब चिढ़ाती,
देखकर लाचारी शेर की मन ही मन मुस्काती।

उस मक्खी से पार पाने का मिला न कोई चारा,
बोला शेर ओ मक्खी बहना तू जीती मैं हारा।

मद में चूर बोली ओ हाथी करो मुझे सलाम
वनराज हराया है मैंने अब जंगल मेरा धाम।

सिरफिरी के करता मुँह लगना हाथी ने यह सोचा,
किया प्रणाम सूँड उठाकर इक दिन खायेगी धोखा।

देख रही थी एक लोमड़ी यह सारा ही नजारा,
एक मक्खी से हार गए सब कैसे होगा गुजारा।

लोमड़ी बोली बहादुर मक्खी देखो मकड़ी काली,
अभी-अभी सुना है मैंने तुमको देती थी  गाली।

गुस्से से मक्खी बौखला कर उलझ बैठी जाल में,
समझ गई कि फँस चुकी है चतुर लोमड़ी की चाल में।

इसीलिए कहते हैं बच्चों ठीक नहीं चतुराई,
मद में चूर होकर मक्खी ने खुद ही जान गँवाई।

रचयिता
आरती रावत पुण्डीर,
प्रधानाध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय असिंगी,
विकास खण्ड-खिर्सू,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. बहुत सुंदर रचना💕

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  2. बहुत सुंदर कविता mam👌👌

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