विपरीतार्थक शब्द
सिक्के के होते दो पहलू
सिर्फ होता है एक ज़रूरी
ये कैसे कह दूँ?
विपरीतार्थक शब्द हैं ऐसे
सिक्के के हों दो पहलू जैसे......
(दिन-रात)
दिन के बाद रात है आई
स्वप्न सलोने सुंदर लाई
थक कर निद्रा खूब है आई
फिर दिवस ना हो तो क्या हो भाई?
(आगे-पीछे)
प्रार्थना की पंक्ति में
कोई आगे है कोई है पीछे
हर कोई आगे आना चाहे
पीछे न कोई जाना चाहे
न कोई हो आगे और न कोई हो पीछे
फिर पूरी होगी पंक्ति कैसे?
(लंबा-छोटा) (गोरा-काला)
है कोई लंबा और कोई छोटा
कोई है गोरा और कोई काला
गम न करो तुम इस बात का
ईश्वर की हर कृति है सुंदर
कृतज्ञ रहो तुम स्वयं के अंदर
गुणों से मिलता है सम्मान
वरना होगी कैसे पहचान?
(पूरब-पश्चिम)
सूर्य निकलता है जब भोर
दिशा जान लो पूरब उस ओर
दिन -रात न चमके सूरज भाई
इसलिये दिशा पश्चिम है बनाई
दिशा न गर हो पूरब -पश्चिम
क्या होगा गर हो बस दिन -दिन?
(ऊँचा-नीचा)
धरती नीची अम्बर ऊँचा
कुछ ऊँचा है, है कुछ नीचा
महत्व है सबका अपना-अपना
सर्वत्र हो धरती या सर्वत्र हो अम्बर
सोचो तो फिर कैसा होगा?
(हाँ-नहीं)
हाँ-हाँ करके न बनो चाटुकार
नहीं-नहीं को मिलती फटकार
पर हर पल हाँ-हाँ ठीक नहीं है
कभी नहीं कहना भी सीखो
दोनों की है अपनी महत्ता
परिस्तिथियाँ तुम समझ के बोलो
गर हर बात में हाँ हो या
हर बात में हो ना
फिर न्याय का फैसला कैसे होगा?
.
रचयिता
अंशु सिंह,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय भिक्कनपुर,
विकास खण्ड-रजापुर,
जनपद-गाजियाबाद।
सिर्फ होता है एक ज़रूरी
ये कैसे कह दूँ?
विपरीतार्थक शब्द हैं ऐसे
सिक्के के हों दो पहलू जैसे......
(दिन-रात)
दिन के बाद रात है आई
स्वप्न सलोने सुंदर लाई
थक कर निद्रा खूब है आई
फिर दिवस ना हो तो क्या हो भाई?
(आगे-पीछे)
प्रार्थना की पंक्ति में
कोई आगे है कोई है पीछे
हर कोई आगे आना चाहे
पीछे न कोई जाना चाहे
न कोई हो आगे और न कोई हो पीछे
फिर पूरी होगी पंक्ति कैसे?
(लंबा-छोटा) (गोरा-काला)
है कोई लंबा और कोई छोटा
कोई है गोरा और कोई काला
गम न करो तुम इस बात का
ईश्वर की हर कृति है सुंदर
कृतज्ञ रहो तुम स्वयं के अंदर
गुणों से मिलता है सम्मान
वरना होगी कैसे पहचान?
(पूरब-पश्चिम)
सूर्य निकलता है जब भोर
दिशा जान लो पूरब उस ओर
दिन -रात न चमके सूरज भाई
इसलिये दिशा पश्चिम है बनाई
दिशा न गर हो पूरब -पश्चिम
क्या होगा गर हो बस दिन -दिन?
(ऊँचा-नीचा)
धरती नीची अम्बर ऊँचा
कुछ ऊँचा है, है कुछ नीचा
महत्व है सबका अपना-अपना
सर्वत्र हो धरती या सर्वत्र हो अम्बर
सोचो तो फिर कैसा होगा?
(हाँ-नहीं)
हाँ-हाँ करके न बनो चाटुकार
नहीं-नहीं को मिलती फटकार
पर हर पल हाँ-हाँ ठीक नहीं है
कभी नहीं कहना भी सीखो
दोनों की है अपनी महत्ता
परिस्तिथियाँ तुम समझ के बोलो
गर हर बात में हाँ हो या
हर बात में हो ना
फिर न्याय का फैसला कैसे होगा?
.
रचयिता
अंशु सिंह,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय भिक्कनपुर,
विकास खण्ड-रजापुर,
जनपद-गाजियाबाद।

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