बन करके शमशीर चला

परिचय-यह कविता एक शहीद को समर्पित है जिसकी शहादत
हमें उसके लिए आँसू बहाने के बजाय उस पर गर्व महसूस करने के लिए प्रेरित करती है।


मातृभूमि पर प्राण लुटाकर, जब देखो एक वीर चला।
घटा शत्रु का  मान जहां में, बन करके शमशीर चला।

काँपा होगा शत्रु थर-थर
 जब वार किया तुमने होगा।
मिट्टी पर मिट्टी में मिलाकर जब शत्रु ख़ाक किया होगा।
झुका दिए आभिमानी माथे-2 बनकर जब एक तीर चला।
घटा शत्रु का मान जहां में,
बन करके शमशीर चला।

पाषाण कलेजा कर माँ ने, जब अन्तिम बार प्रणाम किया।
लाज रखी है, दूध की मेरे,
ऐसा कह अभिमान किया।
देकर प्राणों की आहूति-2  शत्रु-सीना चीर चला।
घटा शत्रु का मान जहां में,
बन करके शमशीर चला।

आने वाली पीढ़ी जब-जब,
नाम तेरा दोहराएगी
वीर शहीदों में तेरी,
गाथाएँ गाई जाएँगी।
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु- 2
बन ऐसा बलवीर चला
घटा शत्रु का मान जहां में,
बन करके शमशीर चला।

रचयिता
डॉ0 रेणु देवी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय नवादा, 
विकास खण्ड व जनपद-हापुड़।

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