कान्हा! अब तो बजा दो बाँसुरिया

 साँवली सुरतिया, मीठी बतियाँ
 चरण कमल और चंचल अखियाँ
 चंद्र बदन, निहारती सखियाँ
 मोर मुकुट, कटि करधनिया
 छम-छम बाजे पैजनिया
 पीतांबर धारी मोहन मुरारी
तेरी मुस्कान पे जाऊँ वारी
 नंदकिशोर सुन ओ तिरुपुरारी
 तोपे बलिहारी जाऊँ सांवरिया
 कान्हा! अब तो बजा दो बाँसुरिया।।

 मुरली जब अधरोस्पर्श पाए
 मकरंद सी मधुर ध्वनि सुनाए
 तन-मन पुलकित हो जाए
 कानन उपवन हो जाए
 चहुँओर बसंत छा जाए
 प्रेम राग से तटनी उफनाए
गागर मोरी छलकत जाए
 मुरली की धुन पर थिरकूँ
 सुध बुध मैं भूली सांवरिया
कान्हा! अब तो बजा दो बाँसुरिया।।

 जोगी ये तेरी जोगन
वन उपवन लगी टोहन
 अब तो आ जाओ मोहन
 व्याकुल ये तेरी गुजरिया
 छलकत नयन भीगी चुनरिया
 स्पंदित अधर माँगे अरज
 तरसे नैना दे दे दरस
 बाट जोहत बीते बरस
 नाचूँगी अबतो  होके बावरिया
कान्हा! अब तो बजा दो बाँसुरिया।।

रचयिता
रीनू पाल,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय दिलावलपुर,
विकास खण्ड - देवमई,
जनपद-फतेहपुर।

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