चरख
चरख चला भई चरख चला।
मेले में एक चरख चला।
कितना ऊँचा झूला है।
बच्चा बच्चा फूला है।
कितना ऊपर जाता है,
आसमान छू आता है।
जब नीचे को आता है,
शून्य भार हो जाता है।
लगता जैसे दम निकला।
चरख चला भई चरख चला।।
चरख व जीवन एक समान।
जग-मेले में हैं गतिमान।
हम ऊँचाई पाते हैं,
मन ही मन हरषाते हैं।
कठिन दौर जब आता है,
तब-तब मन घबराता है।
फिर भी चरख न छोड़ा जाता।
फिर भी धैर्य न छोड़ा जाता।
काँटों में भी फूल खिला।
चरख चला भई चरख चला।।
रचयिता
अशोक पाल सिंह चौहान,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय गांगूपुरा,
विकास क्षेत्र-जैथरा,
जनपद-एटा।
मेले में एक चरख चला।
कितना ऊँचा झूला है।
बच्चा बच्चा फूला है।
कितना ऊपर जाता है,
आसमान छू आता है।
जब नीचे को आता है,
शून्य भार हो जाता है।
लगता जैसे दम निकला।
चरख चला भई चरख चला।।
चरख व जीवन एक समान।
जग-मेले में हैं गतिमान।
हम ऊँचाई पाते हैं,
मन ही मन हरषाते हैं।
कठिन दौर जब आता है,
तब-तब मन घबराता है।
फिर भी चरख न छोड़ा जाता।
फिर भी धैर्य न छोड़ा जाता।
काँटों में भी फूल खिला।
चरख चला भई चरख चला।।
रचयिता
अशोक पाल सिंह चौहान,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय गांगूपुरा,
विकास क्षेत्र-जैथरा,
जनपद-एटा।

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