एक बूँद

जल रहा है ये समाज नफरतों की आग से
है घृणा चहुँओर बरसी अपनों के ही साथ से।
अब खो गई इन्सान की इन्सानियत संसार से,
पहचान होती मनुज की रक्त की एक बूँद से।

निरीह स्वार्थी बन गया जन आज इस संसार में,
अपना लक्ष्य पूरा करें चाहे किस अभिप्राय से।
बन गयी है जीविका यदि धूप छाँव सी अगर,
सींचकर दे दो उड़ान  प्रेम की एक बूँद से।

हार न मानी सभी उड़ गयीं धुआँ बन मुश्किलें,
मंजिल समीप होती गई जिस पथ पर पग धरे।
पुष्प सा मन है सुसज्जित साथ मेरे तुम जो हो,
बह निकल जाता है दर्द आँख की एक बूँद से।

जीत की हो प्यास तो समन्दर भी लगता है कम,
लक्ष्य हो ऊँची उड़ान का आसमां लगता है कम।
कठिनाइयों की धूप से पिघलते नहीं हौंसले,
बुझती नहीं जुनूं की प्यास ओस की एक बूँद से।
                 
रचयिता
शगुफ्ता रहमान 'सोना',
प्रधानाध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय धीमरखेड़ा नवीन,
विकास खण्ड-काशीपुर,
जनपद-ऊधम सिंह नगर,
उत्तराखण्ड।

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