आओ मोरे कृष्ण कन्हैया

आओ मोरे कृष्ण कन्हैया
कलयुग में भी छवि दिखलाओ
कई नैन प्यासे हैं अब भी
एक बार तो दर्श  कराओ।

पुनः वसुंधरा कुपित हुई है
कई दुर्योधन और शिशुपालों से।
सबके चेहरे  धृतराष्ट्र बने हैं
 मन के कालिक शकुनी से।

द्रौपदी के चीर हरण  सी
गली-गली  विष गागरी है।
तब तो  मात्र द्रोपदी हारी
हार रही आज  हर  नारी है।

नहीं कोई भी कृष्ण यहाँ
रणभूमि में जो  गीता रच दे।
हर चेहरा लाक्षागृह यहाँ
पता नहीं कब भस्म कर दे।

घर के बाहर आज हर बेटी
द्रौपदी सी कुपित और सहमी हुई।
नहीं किसी नर में इतना दम
साहस भर उसमें, जो है डरी हुई।

भारत के महान पुरुष तुम
हम सब के मान अभिमान हो तुम।
पुनः भारत की धरती पर आकर
धन्य कर  तो हर प्राणी को तुम।

  गाँव-गाँव  फिर वृन्दावन  बने
 गाय, ग्वाले दूध दही के धारे बहें।
 हर  शहर, राज्य  इंद्रप्रस्थ  बने
 सुख शांति समृद्धि की सरिता बहे।

ना राग  कोई द्वेष हो
नाही बैरी कोई किसी का हो।
मिलजुल कर  रहे सभी
वसुधैव कुटुंबकम भाव सबमें हो।

हर बेटी का मान हो घर में
घर के  बाहर हो सम्मान।
 बेटों   को  ये सीख  मिले
 लड़की का करें हर हाल सम्मान।

आओ कृष्ण जन्माष्टमी मनाएँ
हर घर खुशी का दीप जलाएँ।
कान्हा के जन्मोत्सव पर सब, उनके
आदर्शों पर चलने की कसम खाएँ।

रचयिता
सन्नू नेगी,
सहायक अध्यापक,
रा0 उ0 प्रा0 वि0 सिदोली,
विकास खण्ड-कर्णप्रयाग, 
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

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