बाल श्रमिक

ढोता बोझा सिर पर अपने
कभी बेचता सब्जी
घरवालों का पेट पालता
अपना बचपन खोता।।

दूर -दूर नाता न होता
कभी किताब और बस्ता
अपनी धुन में चला जा रहा
अपना बचपन खोता।।

आँखों में सपने हैं फिर भी
जूठी प्लेट उठाता
सुबक - सुबक कर आँखें पोंछे
सबकी गाली खाता।।

कभी केतली थाम हाथ में
सबको चाय पिलाता
पर उन नन्हें हाथों में
कोई पुस्तक न पकड़ाता।।

बाल मजदूर नियम हैं बनते
संदेश रोज ही सुनते
बैठ के कुर्सी आर्डर देते
छोटू कहकर बुलाते।।

करवाते मजदूरी उससे
भूखे पेट सुलाते
कुचल रहे हैं सपने उनके
तरस नहीं हैं खाते।।

मत कर धोखा मासूमों से
मत छीनो इनका बचपन
जी लेने दो इनको खुलकर
अभी है उनका लड़कपन।।

रचयिता
ज्योति अग्निहोत्री,
प्राथमिक विद्यालय शेखनापुर घाट,
विकास खण्ड-गोसाईंगंज,
जनपद-लखनऊ।

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