कान का गान

कान से संबंधित चंद कहावते दोहों के माध्यम से प्रस्तुत हैं

कच्चे हैं वो कान के, कब  करते  विश्वास।
तभी मध्य परिवार के, उपजे रोज खटास।।०१

हम कब से चिल्ला रहे, मगर न दें वे  ध्यान।
कान न देते बात  पर, देख सभी हैरान।।०२

हम उनके चातुर्य सेे, अब तक थे अनजान।
काट रहे  हैं  कान  वो, चबा-चबाकर  पान।।०३

कुछ ऐसा भर कीजिए, सभी रहें अनजान।
लगे   न  मेरे  काम  की, खबरें  कानों-कान।।०४

जूँ ना रेंगे कान पर, हैं खुद में मशगूल।
सावन की बूँदों तले, खूब रहे वो झूल।।०५

ग़र ना सुनते बात वो, कान  कीजिए  गर्म।
शायद गैरत से  उन्हें, आ  जाए  कुछ  शर्म।।०६

वे अब तक सुधरे नहीं, ढीठ बडे़ हैं ठेठ।
मैं दस्तक देता  रहा, उनके  कान  उमेठ।।०७

जरा-जरा -सी बात पर, भर देते हैं कान।
करते केवल चुगलियाँ, बैठ लोग दालान।।०८

कान लाल उनके हुए, चुगली सुनकर मित्र।
गुस्से  में  दिखने  लगे, हमको   वे  सौमित्र।।०९

कान मूँदकर रह गए, सुनी न मेरी  बात।
अनसुलझे ही रह गए, मेरे सब  हालात।।१०

सुनकर मेरे फट गए, अब तो दोनों  कान।
डी.जे. के इस शोर से, हालत है हलकान।।११

बाबा  जी  ने  कान   में, फूँक  दिया  है  मंत्र।
मैं भी निकलूँ तोड़कर, अब अधिनायक-तंत्र।।१२

धीरे-धीरे ही करो, अपनी बात बयान।
होते हैं इस  दौर  में, दीवारों  के  कान।।१३

असमंजस में पड़ गया, खुजा रहा हूँ कान।
मैं  बिगड़े   हालात  पर,  कबसे  हूँ   हैरान।।१४

साहब जी हमको लगे, बड़े कान के तेज।
रखते हैं हर बात को, मन में सदा सहेज।।१५

अनदेखी होने  लगी, बच्चे  रहे  धकेल।
मैडम जी सोतीं रहीं,डाल कान में तेल।।१६

कान पकड़कर कीजिए, सभी भूल स्वीकार।
शायद आ जाए रहम, मुझको  भी  इस  बार।।१७

नौ लक्खे के हार को, चुरा गया मेहमान।
घरवालों को ना  हुईं, खबरें  कानों-कान।।१८

रचयिता
नवनीत चौधरी विदेह,
प्रभारी प्रधानाध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय रजपुरा,
विकास खण्ड:- रूद्रपुर,
जनपद:- ऊधम सिंह नगर,
उत्तराखण्ड।

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