जीवन है अनमोल
सृष्टि का दिया उपहार है देह
फिर क्यों न तुझे है खुद से स्नेह?
लिया तूने है धरा पे जनम
फिर क्यों करता है प्राण हनन?
क्या इतना दुर्बल तेरा तन?
ममता का छाँव न आया मन
गीता का सार है कर्म प्रधान
मानव बनता है इसी से महान
तनिक न तुझे है खुद का भान
क्या कायरता है तेरी शान?
जवान सरहद पे शहीद हो रहे
कोई मौत पे बेवजह झूल रहे
नौनिहाल हैं भविष्य के सपने
अनुसरण उनका ये भी करते
भगवद्गभक्ति भाव के पथ से
न होवें अपराध जगत में फिर से
हैं जीवन के पल अनमोल
आनंद का रस हृदय में घोल
रचयिता
दीपा पाण्डेय,
प्रवक्ता संस्कृत,
राजकीय बालिका इंटर कॉलेज काकड़,
विकास खण्ड-बाराकोट,
जनपद-चम्पावत।
फिर क्यों न तुझे है खुद से स्नेह?
लिया तूने है धरा पे जनम
फिर क्यों करता है प्राण हनन?
क्या इतना दुर्बल तेरा तन?
ममता का छाँव न आया मन
गीता का सार है कर्म प्रधान
मानव बनता है इसी से महान
तनिक न तुझे है खुद का भान
क्या कायरता है तेरी शान?
जवान सरहद पे शहीद हो रहे
कोई मौत पे बेवजह झूल रहे
नौनिहाल हैं भविष्य के सपने
अनुसरण उनका ये भी करते
भगवद्गभक्ति भाव के पथ से
न होवें अपराध जगत में फिर से
हैं जीवन के पल अनमोल
आनंद का रस हृदय में घोल
रचयिता
दीपा पाण्डेय,
प्रवक्ता संस्कृत,
राजकीय बालिका इंटर कॉलेज काकड़,
विकास खण्ड-बाराकोट,
जनपद-चम्पावत।

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