कबूतर

देखो उड़कर आए कबूतर।
            छत पर दाना खाए कबूतर।।

काले, चमकीले, सफेद कबूतर।
             मन को कितना भाएँ कबूतर।।

गुटर गूँ, गुटर गूँ करे कबूतर।
            सुन आहट उड़ जाएँ कबूतर।।

हाथों में जब लेकर देखूँ
              मूझे निहारे जाएँ कबूतर।।

कहीं कहीं पेड़ों पर देखो।
         मांझे में फँसे फड़फड़ाए कबूतर।।

मांझे का ना प्रयोग करेंगे।
        फिर शायद बच जाएँ कबूतर।।

रचयिता 
कमलेश प्रसाद वर्मा,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय रिकेबीपुर,
विकास खण्ड-रामपुर,
जनपद-जौनपुर।

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