चिंतन

यूँ बच्चों का स्वयं,
चिर निंद्रा में जाना,
हृदय द्रवित कर जाता है
क्यों इतने कमजोर हो गए,
कुछ समझ नहीं आता है।

जीने की ललक और हौंसला,
जाने क्यों खो जाता है?
उठाते हैं आत्मघाती कदम,
ऐसा क्या हो जाता है?

माँ बाप का प्यार,
भाई- बहन का चेहरा,
कोई कैसे भूल जाता है?
छोड़कर सारी दुनिया,
क्यों फंदे में झूल जाता है?

पल-पल जीते तुम्हें देखकर,
तुम बिन कैसे जी पाएँगे?
जीना उनकी मजबूरी होगी,
जीते जी वो मर जाएँगे।

ये सब पुनरावृत्ति ना हो,
इसके लिए हमको आगे आना होगा
करना है चुनौतियों हेतु तैयार,
 यह हमको भी समझना होगा,

किताबी ज्ञान सब कुछ नहीं,
उससे बड़ा जीवन का मोल।
बच्चों को जीना सिखलाएँ,
क्योंकि जीवन है अनमोल।

याद रखें समस्या अगर है,
तो समाधान भी उसका होगा।
माता-पिता, परिवार के खातिर,
तुम्हें हर हाल में जीना होगा,
तुम्हें हर हाल में जीना ही होगा।

रचयिता
सरस्वती उनियाल,
सहायक अध्यापिका, 
राजकीय आदर्श प्राथमिक विद्यालय डाकपत्थर,
विकास नगर-देहरादून,  
उत्तराखण्ड।

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