शक्ति दर्शन 8, अपर्णा पाल, औरेया
*शक्ति दर्शन 8*
*मन की बात.............स्त्री शिक्षा-सामाजिक परिप्रेक्ष्य में -स्त्री ईश्वर की सर्वोत्तम रचना है*
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माँ से ही दुनिया है, वही सृष्टि का आधार है और वह अगर सुशिक्षित हो तो कहना ही क्या? तब समाज को उन्नतिशील होने से कौन रोक सकता है ?
किसी भी राष्ट्र में स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर ही नागरिकता के समीकरणों को पूरा करते हैं और जहाँ पर मनुष्यता का आधा हिस्सा स्वयं को नीचा मानता हो वहाँ पूर्ण विकास कभी सम्भव नही हो सकता।स्त्री ने हर क्षेत्र में सफलता के झण्डे गाड़े हैं।डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट एवं नौसेना तक वह नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है।
परन्तु हमारी जनसंख्या को देखते हुए ऐसी स्त्रियों की संख्या नगण्य है।छोटी जगहों, गाँवों में ऐसा ना हो पाने का कारण है-रूढ़िवादिता और स्थापित मानकों से बाहर निकलने का भय।बहुधा देखा गया है कि स्त्रियाँ ही ऐसी विचारधारा के लिए उत्तरदायी होती हैं।देहाती परम्परा के अनुसार बहुओं को घर के किसी भी फैसले में कुछ कहने का अधिकार नही होता, वस्तुतः यह परम्परा विकृत मानसिकता को जन्म देती है जिससे स्त्रियाँ स्वयं को तुच्छ, हीन और असमर्थ मानने लगती हैं।यही मानसिकता समय आने पर उनकी दबी हुई भावनाओं को लड़ाई, झगड़े व अन्य ओछी हरकतों के रूप में प्रकट करती है और उनका रोष गलत तरीके से प्रकट होने लगता है।
दरअसल इन सबका मूल कारण है अशिक्षा जो शिक्षित महिलाएँ इसका विरोध करती हैं उन्हें संस्कारहीन होने का कलंक झेलना पड़ता है।इसलिए दहेज हत्या, मादा भ्रूणहत्या जैसी घटनाएँ आये दिन अखबारों में स्थान पाती हैं।
एक पढ़ी-लिखी माँ अपने बच्चों का बेहतर ढंग से पालन कर सकती है, यही नही वह अपने पति के कार्य क्षेत्र में भी सहयोग कर सकती है।कौन कहता है कि पढ़-लिखकर स्त्रियाँ घर-गृहस्थी के कर्तव्यों से विमुख हो जाती हैं ?निश्चित ही ऐसी सोच रखने वाले संकीर्ण विचारधारा से ग्रसित होते हैं।एक सुशिक्षित स्त्री अधिक सभ्य तरीके से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकती है।अतएव बुद्धिजीवी वर्ग को चाहिए कि वह स्त्री शिक्षा को अधिक कारगर बनाने का प्रयास करें ताकि हम सब एक सुशिक्षित समाज की स्थापना कर सके।
*अपर्णा पाल*
औरेया
*संकलन:-*
*टीम मिशन शिक्षण संवाद शक्ति परिवार*
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