95/2025, बाल कहानी- 07 जुलाई
बाल कहानी- सच्ची मदद
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रिंकी और कनक दो दोस्त थीं। दोनों में बहुत गहरी दोस्ती थी। वे साथ-साथ ही बाहर जाती थीं। एक दिन दोनों एक होटल में गयीं, वहाँ पर बहुत बड़ा कार्यक्रम हो रहा था। उस कार्यक्रम में एक बहुत ही होनहार लड़की थी, जिसे कलेक्ट्रेट साहब ने सम्मानित किया। बताया गया कि वह लड़की न तो बोल पाती है, न ही चल पाती है, फिर भी उसने इतनी छोटी सी उम्र में एक ऐसी पुस्तक लिखी, जो सच में प्रशंसा के योग्य थी। सभी उपस्थित लोग उसकी तारीफ कर रहे थे।
जब उसे स्टेज में बुलाया गया और अपने बारे में कुछ बोलने को कहा गया तो वह संकुचाते हुए स्टेज पर पहुँची।
कलेक्ट्रेट साहब ने उसका मनोबल बढ़ाते हुए उसे अपनी भाषा में कुछ बोलने को कहा। तब उसने अपने इशारों की भाषा का प्रयोग करते हुए बताया, "बचपन से ही वह ऐसी नहीं थी, लेकिन एक हादसे के दौरान उसकी ऐसी स्थिति हो गई।" सभी ने उत्सुकता पूर्वक उसकी कहानी को जानना चाहा, तब उसने बताया कि, "एक दिन मेरे घर का सिलेण्डर फट गया। आवाज सुनकर वह भी उस स्थान पर पहुँच गयी। घायलों में कुछ को तो बचा लिया, लेकिन उस हादसे में उसने अपने दोनों पैर खो दिए। हादसे के भयंकर रूप को देखकर वह सहम गई। कुछ बोल न सकी। तभी से उसकी आवाज भी चली गई, लेकिन अधिकांश लोगों को सुरक्षित बचा सकी।
सच! सभी लोग आज के समय में ऐसा सोचने लगें तो सभी की मदद की जा सकती है।
संस्कार सन्देश-
अगर हमारे अन्दर सहयोग और परोपकारिता की भावना हो तो हम बहुत लोगों की मदद कर उन्हें बड़े संकट से बचा सकते हैं।
कहानीकार-
#अंजनी_अग्रवाल (स०अ०)
उच्च प्रा० वि० सेमरुआ
सरसौल, कानपुर नगर
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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