महिला सशक्तीकरण विशेषांक-335

*👩‍👩‍👧‍👧महिला सशक्तीकरण विशेषांक- 335*

*मिशन शिक्षण संवाद परिवार की बहनों की संघर्ष और सफ़लता की कहानी*


दिनांक- 28.06.2025

नाम :- शशि सिंह
पद :- सहायक अध्यापक
विषय :- विज्ञान
विद्यालय :- पूर्व माध्यमिक विद्यालय कुरसंडा, भावलखेड़ा, शाहजहांपुर

*सफलता एवं संघर्ष की कहानी :-*👉
रुचियां - लेखन(नारी विमर्श, यात्रा संस्मरण, सामाजिक सरोकार, कहानी, कविताएं, लेख आदि) कबाड़ से जुगाड, क्राफ्ट , चित्रकारी, बागवानी, और संगीत सुनना और समाज सेवा
शिक्षा -- B Sc, B Ed, M Ed
आसान नहीं है खुद की राह बनाना,
अपने हिस्से का आसमान पाना।
तुम अपने पंखों को और थोड़ा फैलाना।
अंबर के उस छोर को भी छू आना।
गर्व का सबब होती हैं तुम जैसी बेटियाँ।
जो झिटक देती हैं क्षण भर में समाज की रूढियाँ।
दुनिया की तमाम बेटियों को समर्पित हैं ये स्वरचित पंक्तियाँ।
       कहते हैं कि जबतक संघर्ष न हो जीवन में तब तक इंसान ठीक से चलना भी नहीं सीख पाता।हमने भी जो कुछ सीखा जीवन के संघर्षों, झंझावातों और सफलताओं से ही लिया थोड़ा थोड़ा। यूँ कहूँ तो संघर्ष मेरे दुनिया में आने से पहले ही शुरू हो गया था। उस घर खानदान में मेरा आना ही मुश्किलों से भरा था जिसमें बेटियां पैदा होना गुनाह माना जाता रहा हो। इस संसार में आँखें  खोलते ही जिनको पुनः विदा कर देने का रिवाज रहा हो।और ये काम बखूबी घर की औरतें ही करती थीं।पर मेरी माँ , पिताजी और बाबा की कोशिशों से मै इस सुंदर संसार को देख सकी।मेरे संघर्षों के साथ ही मेरे माता पिता का भी संघर्ष शुरू हो गया था।शिक्षा से मेरे परिवार खानदान का कोई लेना देना नहीं था।फिर भी मेरे पिता जी ने मैथ्स और फिजिक्स में लखनऊ विश्वविद्यालय से पोस्टग्रेजुएशन किया बाद में बी एड करने के उपरांत एक कॉलेज में प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हुए।ये हमारे हक में था।हमारी शिक्षा के लिए हमको शहर लाना हम सबके जीवन और अगली पीढ़ियों के लिए एक क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी कदम था। माँ ने भी हमारी पढ़ाई के साथ साथ अपनी भी पढ़ाई जारी रखी।और आज तक वो हमारी रीढ़ बनी रहीं। परिणामतः मैं अपने गांव की प्रथम ग्रेजुएट लड़की रही। शायद पढ़ाई के बाद मैं शिक्षण क्षेत्र में ना ही आती पर ग्रेजुएशन के तुरंत बाद जीवन में घटित कुछ घटनाओं के कारण मैं दो वर्ष गहरे अवसाद में रही। मेरे दोस्तों ने मुझे इस से बाहर निकालने के लिए शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में मेरी नियुक्ति करवा दी।अब मुझे मजबूरन घर से निकलकर बच्चों के बीच जाना ही पड़ा और यही मेरे लिए संजीवनी बन गया।बच्चों के बीच मैं सब कुछ भूल सी गई।आज भी वो बच्चे मुझसे संपर्क में हैं।लिखने पढ़ने क्राफ्ट के शौक ने भी पुनर्बलन दिया। मुझमें इन आदतों के बीज मेरी माँ ने डाला। विवाह के बाद एक शिक्षित और खुले विचारों वाले परिवार में पहुंचकर मेरी ख्वाहिशों और चाहनाओं को पंख मिले। मैने आगे पढ़ाई जारी रखकर एम एड और सोशियोलॉजी में एम ए भी किया।शिक्षा के क्षेत्र में मेरी पहली सरकारी नियुक्ति शाहजहांपुर के सिंधौली ब्लॉक के रेहरिया में प्राथमिक विद्यालय के इंचार्ज के रूप में हुई। मुश्किलें थीं, आने जाने के साधनों का अभाव और साथ में गांव का वातावरण दोनो ही मुझे परेशान कर रहे थे और मैं अपना काम ठीक से नहीं कर पा रही थी।जबकि उस विद्यालय को मेरी जरूरत शिद्दत से थी। आत्मग्लानि के कारण मुझे वहां से हटना ही पड़ा। 2010 में प्रमोशन के बाद मेरी नियुक्ति शहर से दस किलोमीटर दूर ही उच्च माध्यमिक विद्यालय कुरसंडा में हुई जहाँ भी मुश्किलें थीं पर दिख नहीं रही थीं।बस एक सकारात्मक पक्ष ये था कि हमारे प्रधानाध्यापक महोदय बहुत ही सक्रिय, समर्पित, कर्मठ और बेहतरीन प्रबंधक थे। जिन्होंने हमको अपने कार्यक्षेत्र में पूरी आजादी और सहयोग प्रदान किया था। सहकर्मी शिक्षक साथियों का भरपूर सहयोग मेरी राह आसान बनाता रहा।इस बात को हमेशा मन मस्तिष्क में मंत्र की तरह रखती हूँ कि एक शिक्षक का दायित्व बहुत ही व्यापक होता है। मैं हमेशा बालिकाओं की शिक्षा के समर्थन में रही हूँ। इस गांव में बेटियों की शिक्षा जूनियर स्तर तक ही सीमित कर दी गई थी।उसके बाद कोई भी लड़की आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए गाँव से बाहर नहीं जा सकती थी।ये बहुत ही तकलीफदेह स्थिति थी। प्रतिभावान छात्राओं के लिए मेरी विशेष चिंता थी। आज भी रहती है। अभिभावकों को समझाने का निरंतर प्रयास करती रही। कुछ ने समझा कुछ ने नहीं।पर कोशिश जारी रही।एक घटना याद आती है कि छात्राओं को ब्लॉक स्तर पर खेलकूद प्रतियोगिता गोला चक्काफेंक स्पर्धा में ले जाना था।उन छात्राओं का प्रदर्शन और अभ्यास बहुत ही बढ़िया था विद्यालय में।पर जाने के दिन जब नियत समय पर वो विद्यालय नहीं पहुंची तो दो बच्चों को उन्हें बुलाने के लिए भेजा गया।वापस आकर बच्चों ने बताया कि वो लड़कियां तैयार होकर छत से झांक रही थीं पर उनके पिता लाठी लेकर बाहर बैठे थे, उन्हें न जाने देने के लिए। मैं स्तब्ध थी। क्या कहती? पर निरंतर प्रयासों का नतीजा ये रहा कि आज गांव से हर लड़की बाहर कॉलेज तक जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए आजाद है और उनमें से कई बच्चियों ने प्रदेश स्तर पर भी खेल और शिक्षा में सफलता अर्जित की है।ये हमारे और गांव के लिए गर्व और सुकून की बात तो है ही, इसमें विभाग की भी सफलता है।जब वो मुझसे मिलने आती हैं तो मैं गर्व से भर उठती हूँ और गले लगा लेती हूँ।मै खुद को सौभाग्यशाली समझती हूँ कि बच्चों के दिल के करीब हूँ।वो हमसे अपनी व्यक्तिगत और घरेलू समस्याएं भी साझा करते हैं।मेरी रचनात्मकता, लेखन, प्रकृति से लगाव और संवेदनशीलता मेरे शिक्षणकार्य को और भी सुगम बनाते हैं।जो भी आस पास देखती हूँ महसूस करती हूँ उसे शब्दों और रेखाओं में उतारने की कोशिश करती हूँ।शायद यही मेरी पूजा, धर्म और तपस्या है।मेरा प्रयास अभी तक यही रहा कि मैं बच्चों को केवल कोर्स और पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखूं।उन्हें सोचने समझने, और रचने की आजादी दूँ।एक बेहतर इंसान बनने में सहायता करूँ। आवश्यकता पड़ने पर उनकी तन मन धन से सहायता कर सकूँ। यही मेरे जीवन की ध्येय है और यही हासिल।
मिशन शिक्षण संवाद एक ऐसा पटल है जिस पर हमारे कार्यों नवाचारों को दूसरों तक पहुंचाने का माध्यम मिलता है साथ ही ये माध्यम हमारे कार्य की गुणवत्ता को और परिष्कृत करने, हमारे विचारों को अभिव्यक्ति देने का दायित्व भी बखूबी निभा रहा है।

_✏संकलन_
ज्योति कुमारी(शक्ति संवाद)
*📝टीम मिशन शिक्षण संवाद।*

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