94/2025, बाल कहानी- 05 जुलाई
बाल कहानी- मोल भाव
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प्रशान्त अपनी पत्नी और अपनी छोटी बेटी दिया के साथ बाजार घूमने गया। बाजार में खरीदारी करने के बाद में प्रशान्त ने अपनी पत्नी से कहा, "हमें खरीदारी करते हुए काफी वक्त हो गया है। क्यों न अब हम लोग कहीं रेस्टोरेन्ट में बैठकर कुछ खा लें।" प्रशान्त की पत्नी ने कहा, "आप सही कह रहे हैं। दिया और मुझे दोनों को भूख लगी है। चलिए, कुछ खा लेते हैं।"
प्रशान्त, उसकी पत्नी और उसकी बेटी एक बड़े से रेस्टोरेन्ट में जाकर बैठ गये। प्रशान्त ने वेटर को इशारे से बुलाकर कहा, "एक बर्गर एक पिज़्ज़ा।" उसने कुछ और खाने के लिए ऑर्डर कर दिया। सब लोगों ने खाना खाकर बिल करने के दौरान बेटर को एक अच्छी खासी टिप दी।
प्रशान्त और उसकी पत्नी वापस अपने घर की ओर चल दिए। रास्ते में प्रशान्त की बेटी ने कहा, "पापा! मुझे केले चाहिए।" प्रशान्त ने कड़ी धूप में खड़े हुए ठेले वाले व्यक्ति से कहा, "क्या हिसाब के केले दे रहे हो?"
ठेल वाले ने कहा, "चालीस रुपए किलो।" प्रशान्त ने कहा, "चालीस रुपए किलो कौन देता है भाई? कल तो तीस रुपए किलो मिल रहे थे.. क्या मैं ही मिला हूँ तुम्हें लूटने के लिए?" केले वाले ने कहा, "नहीं भाई साहब! आज मण्डी में भाव बढ़ गया है।" प्रशान्त ने कहा, "ठीक है, तोल दो, पर पैसे कम करना होगें।" ठेले वाला कहने लगा, "नहीं बाबूजी! मुझे कुछ नहीं बचेगा।" तभी प्रशान्त की बेटी ने कहा, "पापा! आपने तो बेटर को फ्री में ही पैसे दे दिए थे और हमने रेस्टोरेंट में कितनी महँगी चीज खायी थीं।" यह सब सुनकर प्रशान्त का सर नीचे हो गया और उसने चुपचाप केले वाले को बिना कुछ कहे उससे केले खरीद लिए और अपने घर की ओर चल दिया। रास्ते भर उसे आत्मग्लानि होती रही कि महज दस रुपए के पीछे उसने केले वाले से इतना मोल-भाव किया है, जो कि इतनी कड़ी धूप में दो पैसे कमाने की खातिर खड़ा हुआ है और रेस्टोरेन्ट में बिना कहे ही जितनी मर्जी होती है, उतना भुगतान करते हैं। वहाँ हम कभी मोल-भाव नहीं करते हैं। आज के बाद उसने दो-चार रुपए के पीछे मोल-भाव न करने की ठानी ताकि गरीब आदमी चार पैसे कमा सके।
तभी अचानक उसकी बेटी बोली, पापा! घर आ गया है। आप आगे क्यों निकले जा रहे हैं?"
प्रशान्त बोला, "हाँ, बेटी! मैं कुछ ज्यादा ही आगे निकल गया था, मगर अब मैं पीछे चलने का प्रयास करूँगा।" उसकी बेटी बोली, "क्या? प्रशान्त ने कहा, "कुछ नहीं, चलो बेटा! अन्दर चलें।" सभी अन्दर चले गये।
संस्कार सन्देश-
हमें गरीब, ठेले धकेलने वालों से देर तक मोल-भाव नहीं करना चाहिए। उनका भी परिवार होता है।
कहानीकार-
शालिनी (स०अ०)
प्राथमिक विद्यालय नगला कूँड़
विकास क्षेत्र- करहल
जनपद- मैनपुरी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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