112/2025, बाल कहानी - 26 जुलाई
बाल कहानी- संवेदना
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जीवन के पचासवे वसन्त को पार करने के बाद कठिन परिश्रम के उपरान्त गोपाल की शिक्षक के पद पर नियुक्ति हो गयी थी। घर में खुशियाँ छा जाती हैं। परिवार के सभी सदस्य सोचते हैं कि अब हमारे दुःख के दिन कट जाएँगे। गोपाल ने भी इस नौकरी से यही उम्मीद की थी। परिवार में पत्नी रामा और दो पुत्र मदन और मोहन और एक पुत्री राधा थी। मदन की उम्र पच्चीस वर्ष और मोहन की उम्र बीस वर्ष है और राधा की उम्र अठारह वर्ष है। मदन पिता की सरकारी नौकरी की लिप्सा के आगे मजबूर होकर दिल्ली में एक मील में नौकरी करके परिवार का भरण-पोषण में सहयोग किया करता था। गोपाल ने निर्णय लिया कि वह मदन की पत्नी को शिक्षक बनाने के लिए स्नातक के उपरान्त शिक्षा का प्रबन्ध करेगा और छोटे पुत्र मोहन को उच्च शिक्षा दिलाकर योग्य बनायेगा, ताकि वह अभी से ही सफलता की राह को आसान बनाते हुए मन्जिल को पार कर सके। गोपाल ने एक-एक पाई जोड़ते हुए अपनी बहू और छोटे पुत्र को शिक्षा स्नातक उपाधि प्राप्त करने में आर्थिक मदद की और दोनों प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। पुत्री राधा को स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त एक अच्छे परिवार में उसका विवाह कर देता है।
आज नौकरी करते हुए गोपाल को दस वर्ष बीत चुके हैं। सेवा के मात्र दो वर्ष शेष हैं। गोपाल के पुत्र और बहू दोनों को अब तक कोई नौकरी नहीं मिल पायी है। विद्यालय पहुँचकर बहुत उदास बैठा है। सोच रहा है कि, "बीते दस वर्षों में मैंने परिवार के लिए तीन जमीनें खरीदी। पुत्र और बहू की शिक्षा का प्रबन्ध किया परन्तु अभी तक दोनों सफल नहीं हुए, पुत्री का विवाह कर दिया। पुत्री के विवाह के लिए बैंक से लिया गया कर्ज आज भी जमा कर रहा हूँ। जो भी वेतन मिल रहा है, उससे परिवार का खर्च निर्वहन कर रहा हूँ। परन्तु परिवार में किसी भी व्यक्ति की अपेक्षाओं पर कोई नियन्त्रण नहीं है। सभी को लगता है कि मैंने बहुत पैसे कमाकर रखे है। सभी की अपेक्षाएँ बढ़ती जा रही हैं।" गोपाल मन ही मन खुद से बातें किए जा रहा था। गोपाल को उदास देखकर शिक्षक साथी गोविन्द को यह समझते देर न लगी कि आज गोपाल बहुत परेशान है। गोविन्द ने कारण पूछा तो गोपाल ने परिवार की आप-बीती कह सुनायी। गोविन्द ने समझाया कि, "परिवार के सदस्यों की अपेक्षाओं का अन्त नहीं है। परन्तु उन्हें संवेदनशील भी होना चाहिए।" गोविन्द ने गोपाल को समझाया कि, "वह परिवार के सदस्यों को अपनी वास्तविक स्थिति से अवगत कराएँ और उन्हें सकारात्मक होने के लिए कहें।" गोपाल को यह समझ आ चुका था कि उसे अपने परिवार के सदस्यों को अपनी वास्तविक स्थिति के बारें में बताना चाहिए ताकि वह उसे समझ सकें और उसे उम्मीदों के बोझ तले न दबाएँ। घर जाकर गोपाल सभी से अपने मन बात कहता है कि, "जो भी है, सब कुछ आप सभी के लिए है, इस छोटी-सी नौकरी में इससे अधिक नहीं कर सकता था, इसलिए ईमानदारी से मुझे अपना कार्य करने दें।" अब गोपाल की पत्नी, पुत्र व बहू सभी की आँखें खुल चुकी थीं। उनकी आँखों से अधिक उम्मीदों की तस्वीरें धुँधली पड़ चुकी थीं।
#संस्कार_सन्देश -
हमें अपने परिवार से सामर्थ्य अनुसार उम्मीद करनी चाहिए और सदस्यों का मनोभाव समझकर उनका सहयोगी बनना चाहिए।
कहानीकार-
#दीपक_कुमार_यादव (स०अ०)
प्रा० वि० मासाडीह,
महसी, बहराइच (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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