92/2025, बाल कहानी- 03 जुलाई
बाल कहानी- सन्यास और आश्रम (भाग- 2)
----------------------------
दोपहर हो गयी। पानी मैला ही रहा। ऐसा तो आज तक नहीं हुआ। वह फिर वापस आश्रम लौट आया और बुद्ध को सारी बात बतायी। बुद्ध ने कहा, "मुझे उसी नदी का जल पीना है। मैं किसी और नदी का जल नहीं पी सकता। जिसके साथ सदा रहा, उसको छोड़कर किसी और के पास क्यों जाऊँ? क्या यह उचित और न्याय संगत तथा नैतिक है?"
यह बात आनन्द की समझ से परे थी। वह मन मारकर पुन: नदी की ओर चल पड़ा। नदी में बहुत पूर बह रहा था। वह जानता था कि शायद शाम हो जायेगी। वह प्रतीक्षा करते, इधर-उधर देखते वहीं घने पीपल की छाँव में सो गया। जब आँख खुली तो पूर्णमा का चन्द्रमा आकाश और धरती की शोभा बढ़ा रहा था। उसकी शीतल, श्वेत आलोकित चाँदनी से दशों दिशायें जगमगा रही थी। आनन्द ने चारों ओर देखा। प्रकति का अलौकिक सौन्दर्य और नूतन प्रकाश और नदी में बहता, चाँदनी की किरणों से हीरे-मोती सा चमकता स्वच्छ और साफ जल जो अत्यन्त मधुर और शीतल था। बुद्ध के लिए सर्वथा उपयुक्त था। खुशी से आनन्द जल लेकर लौटा। बुद्ध जल पीकर बहुत प्रसन्न हुए।
एक माह बाद फिर वही घटना घटी। इस बार बुद्ध ने कहा कि, "अगर तुम स्वच्छ जल की प्रतीक्षा में सो गये तो तुम विचारों से मुक्त नहीं हो पाओगे। तुम्हें नदी की धार के साथ बहना है, चलना है, जल को साफ होते हुए सजगता से देखना है, तभी तुम समझ पाओगे कि दुनिया में चीजें कैसे बनती और रूपान्तरित होती है। उसके पीछे का राज और सारी कीमिया तुम्हारी समझ में आ जायेगी।"
अबकी बार जब आनन्द बुद्ध के लिए जल लेने गया तो पुन: लौटने की बजाय उसने वहीं धैर्य से, सजगता से प्रतीक्षा की। धीरे-धीरे समय गुजरा। नदी का पानी बहता गया। अब धीरे-धीरे उसकी जगह स्वच्छ और साफ पानी लेने लगा। कुछ ही देर में सरिता का जल बिल्कुल स्वच्छ, पारदर्शी और साफ हो गया। आनन्द जल लेकर आश्रम लौटा। बुद्ध ने घड़े से पानी पिया। आज वह बहुत खुश हुए।
आनन्द ने आज की प्रसन्नता का राज पूछा। बुद्ध ने कहा, "धैर्य और संयम तथा सजगता- ये तीनों चीजें समझ उत्पन्न करती हैं और चेतना को करीब लाने में मदद करती हैं। पहली बार जब तुम जल लेने गये थे, उस समय सो गये थे। चंचलता और उद्विग्नता के कारण तुम कुछ न देख सके और न कुछ समझ सके। आज धैर्य, सजगता और साक्षी-भाव तथा संयम से प्रतीक्षा करने और देखने पर तुम सब कुछ समझ गये और तुम ब्राह्मण होने और वैज्ञानिक अनुसन्धान की ओर मुढ़ चुके हो। एक दिन तुम ब्रह्म को भी पा लोगे, लेकिन उससे पहले तुम्हें स्वयं से गुजरना पड़ेगा, क्योंकि ब्रह्म का मार्ग स्वयं से होकर जाता है और कहीं से नहीं।" बुद्ध की बात सुनकर आनन्द नत-मस्तक हुआ। अब वह रोज नदी तट पर जाता और नदी को घन्टों निहारता और उसके बदलते रुपों को देखता और बुद्ध को लौटकर बताता।
फिर एक दिन बुद्ध ने सभी के समक्ष उसके असली सन्यस्त होने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा, "यहाँ सभी सन्यासी हैं। आज से आनन्द भी इस आश्रम का सन्यासी हो गया है अन्य सभी की भाँति। अब वह बुद्धत्व होने के मार्ग पर अग्रसर है।" महात्मा बुद्ध की बात सुनकर सभी बहुत प्रसन्न हुए।
"यही सही मायनों में सन्यास आश्रम है, जहाँ हम सारी पीड़ाओं से दूर, परे हो जाते हैं। जहाँ सभी एक, सुख-दुःख से परे, हर्ष-ग्लानि में एक समान, जीवन-मृत्यु में एकरस और मन से जल की भाँति स्वच्छ और निर्मल हों, वही आश्रम का सच्चा सन्यासी होता है। जो छोटे बच्चे की तरह विकार रहित और निष्पक्ष, सहज और सरल होता है, वही सच्चा सन्यासी है, चाहे वह घर में रहे या बाहर।" बुद्ध के द्वारा संन्यास की नयी परिभाषा और व्याख्या सुनकर सभी सच्चे संन्यास को समझ गये।
संस्कार सन्देश-
हमें गुरु-वचनों पर विश्वास करना चाहिए और धैर्यपूर्वक ध्यान देकर प्रतीक्षा चाहिए।
कथाकार-
जुगल किशोर त्रिपाठी
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)
✏️टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
Comments
Post a Comment