103/2025, बाल कहानी- 16 जुलाई

#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 103/2025
16 जुलाई 2025 (बुधवार)
#बाल_कहानी - #हरियाली_वापस_आयी
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मुनिया और राजू हमेशा की तरह स्कूल से उछलते-कूदते घर वापस आ रहे थे। जिलाधिकारी के आदेश से जनपद के सभी विद्यालय तापमान बढ़ने के कारण बन्द कर दिए गए थे। मुनिया और राजू छुट्टी के आनन्द में डूबे घर आ गये। रोज की तरह दादी ने दोनों को प्यार किया और वस्त्र बदलकर भोजन के लिए आग्रह भी। जब दोनों भोजन कर रहे थे, तब दोनों की अतिरिक्त खुशी देखकर दादी बोली, "क्या बात है?..बताओ बच्चों! आज तुम दोनों बहुत खुश हो!" 
"हाँ, दादी! हम लोगों की गर्मी के कारण एक सप्ताह की छुट्टी कर दी गई है। दादी! पापा से कहो न.. हम सबको कहीं घुमाने ले चलें।" राजू मचलता हुआ बोला। दादी सोच में पड़ गई, फिर बोली, "रात्रि के भोजन पर हम-सब साथ होंगे न, वहीं पर बात कर लेंगे।" रात हुई, सब चुपचाप भोजन कर रहे थे राजू धीरे से फुसफुसाया, "अब पूछो भी दादी!" दादी ने चश्मा उतारकर साफ किया। फिर राजू के पिता से बोली, "बेटा! बच्चों की एक सप्ताह की छुट्टी हुई है, इन्हें कहीं घुमाने लें चलें..?" राजू के पिता ने कुछ देर सोचा फिर कहा कि, माँ! मुझे तो छुट्टी मिलनी मुश्किल है, पर मैं तुम लोगों का प्रबन्ध कर सकता हूँ। पर जाना कहाँ है?" दादी ने थोड़ी देर सोचा, फिर अचानक उनका चेहरा खिल उठा, "बेटा! अतौर चले जाते हैं। अतौर गाजियाबाद जिले का एक गाँव है, वहाँ दादी के एक और बेटा-बहू अपने बच्चों सिमरन और अद्विक के साथ रहते हैं। बहुत दिन हुए बच्चों से मिलना भी हो जायेगा।" राजू और मुनिया, सिमरन और अद्विक के साथ कुछ समय भी बिता पायेंगे।" 
"ठीक है माँ! मेरा एक दोस्त कम्पनी की तरफ से अतौर जा भी रहा है। मैं तुम लोगों को उसी के साथ भेज देता हूँ।" राजू और मुनिया खुशी से उछल पड़े और सामान पैक करने के लिए भीतर भागे। मुनिया मामी से भी चलने का आग्रह करने लगी, पर मामी ने मामा का ध्यान रखने की बात कहकर मना कर दिया। अब राजू और मुनिया को चैन कहाँ? "दादी अतौर कितना सुन्दर है! बहुत ही हरा-भरा, कल कल बहती हिंडन नदी और सिमरन और अद्विक.. सच में बहुत मजा आयेगा!" 
"ठीक है बच्चों! पर अब चलकर सो जाओ, सुबह यात्रा पर जो निकलना है।" दादी बोली। मुनिया के दूसरे मामा उन सबको लेने आये थे। घर स्टेशन के निकट था और साथ में अधिक सामान न होने के कारण सब पैदल ही चल पड़े, पर रास्ते में राजू को गर्मी लगने लगी। दूर-दूर तक हरियाली का नामोनिशान न था। हरा-भरा अतौर हरियाली के अभाव में लगभग प्राणहीन हो चुका था। "मामा! अतौर तो बिल्कुल उजाड़ व सुनसान हो चुका है। कहाँ गये वह हरे-भरे पेड़, पानी से भरे जलाशय और इठलाती-बलखाती नदी? अरे.. मुनिया! हम लोग सिमरन और अद्विक के साथ छुपाम-छुपाई कैसे खेलेंगे? चिपेन्जे कहाँ पर?" 
"चलो बच्चों! पहले घर चलो.. कुछ खा-पीलो, फिर इन बातों पर चर्चा करेंगे।" भोजन के मध्य मुनिया के मामा ने बताया कि, "गाँव अब गाँव रहा ही नहीं, शहरीकरण, औद्योगिकरण, पेड़ों की अन्धा-धुन्ध कटाई, खेती की जमीनों पर कंक्रीट के जंगल बन गये। पेड़ों के कट जाने से तापमान भी बढ़ने लगा और वर्षा भी प्रभावित होने लगी। ऐसे में हरियाली को तो समाप्त होना ही था।" 
"तो कोई कुछ करता क्यों नहीं, ऐसे हाथ पर हाथ धरने से क्या होगा? मुनिया दृढ़ता से बोली। 
"सिमरन..अद्विक! कल हम दोनों तुम्हारे स्कूल चलेंगे और वहीं से करेंगे शुरुआत, रूठी हरियाली को वापस बुलाने की!" दूसरे दिन राजू और मुनिया सिमरन के स्कूल पहुँचे। मुनिया ने सिमरन की कक्षा अध्यापिका से पेड़ लगाने की बात कही। अध्यापिका बहुत प्रभावित हुई। उन्होंने स्कूल के सभी बच्चों को पेड़ों के महत्व की बात समझायी और हर बच्चे को एक पेड़ लगाने का दायित्व सौंपा। सिमरन ने सबको मुनिया की बहादुरी की कथा सुनायी कि किस प्रकार मुनिया ने पढ़ाई के लिए भी हार नहीं मानी। बच्चे मुनिया से मिलकर बहुत खुश हुए। मुनिया ने अपने नन्हें हाथों से एक पौधा रोपा। इधर वन विभाग भी चैतन्य हुआ। वृक्षारोपण ने जन-आन्दोलन का रूप ले लिया। 'पेड़ लगाओ, पर्यावरण बचाओ' फिर क्या स्कूल, क्या पंचायती भवन या अन्य स्थान, हर जगह पौधा-रोपण होने लगा। देखते-देखते हजारों-हजार पौधे लग गये। अब मुनिया और राजू के जाने का समय भी हो गया। मुनिया ने सिमरन से कहा कि, "मेरे जाने के बाद अब तुम बच्चों की जिम्मेदारी गाँव को बचाने की है।" इधर मुनिया और राजू के स्कूल खुल गए और वे दादी के साथ वापस लौट आये। इधर सिमरन ने लगाये गए पौधों के संरक्षण की कमान सँभाली। 
दिन बीतते गये और साल के अन्त तक पौधे भी काफी बड़े हो गये। गाँव के प्रधान, सचिव, वन विभाग और स्कूल के अध्यापकों ने मिलकर अपना जैव-विविधता रजिस्टर भी बना लिया, ताकि जीवों और वनस्पतियों की सभी प्रजातियाँ संरक्षित हो सकें। एक दिन मुनिया ने सिमरन को फोन पर बताया कि अब बायोडायवर्सिटी रजिस्टर बनाने वाला अतौर गाँव पहला है।" मुनिया बहुत खुश हुई। उसने राजू और दादी
 को भी यह सूचना दी कि आखिर हरियाली को अतौर गाँव वापस आना ही पड़ा।

"संस्कार_सन्देश -
हरे-भरे पेड़-पौधों से हमारा बहुत ही निकट का सम्बन्ध है। हमें इन्हें नहीं भूलना चाहिए।

कहानीकार 
डॉ० #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कंपोजिट विद्यालय कमरौली जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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