महिला सशक्तीकरण विशेषांक-336
👩👩👧👧महिला सशक्तीकरण विशेषांक- 336*
*मिशन शिक्षण संवाद परिवार की बहनों की संघर्ष और सफ़लता की कहानी*
दिनांक- 04.07.2025
नाम:- अनीता पाठक
पद:- सहायक अध्यापक
विद्यालय:- उच्च प्राथमिक विद्यालय लखनो, ज्ञानपुर, भदोही, उत्तर प्रदेश।
*सफलता एवं संघर्ष की कहानी :-*👉
प्रथम नियुक्ति एवं वर्तमान नियुक्ति का विवरण :-
मेरी प्रथम नियुक्ति दिनांक 16 सितंबर वर्ष 2002 को प्राथमिक विद्यालय गोपपुर, विकास खंड - औराई, जनपद - भदोही में हुई एवं वर्तमान में, मैं उच्च प्राथमिक विद्यालय लखनो, ज्ञानपुर, भदोही में सहायक अध्यापक के पद पर वर्ष 2007 से कार्यरत हूँ।
💐प्रारंभिक परिचय:- मेरा जन्म गुजरात राज्य के अहमदाबाद शहर में हुआ। चार भाई बहनों में मैं अपने माता पिता की दूसरी संतान हूँ।पिता एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में स्टोर कीपर थे एवं माता आदर्श गृहणी थी। मैने कक्षा एक से सात तक की शिक्षा म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के विद्यालय से प्राप्त करने के उपरांत आठवीं से बारहवीं तक की शिक्षा सेठ सी एल हायर सेकेंडरी स्कूल अहमदाबाद से प्राप्त की। मुझे बचपन से ही पढ़ने लिखने में खूब रुचि थी।दैनिक अनुभवों की डायरी लिखना,स्कूल मैग्जीन के लिए स्टूडेंट कॉर्नर सेक्शन में हर माह नवीन लेख व कविताएं लिखना,चर्चित पुस्तके पढ़ना,आर्ट फिल्में देखना,विभिन्न डिबेट्स में हिस्सा लेना,भारतीय प्रांतों के विशिष्ट व्यंजन बनाना,ग़ज़लें सुनना इत्यादि मेरी प्रमुख हॉबीज थी जो किशोरावस्था से अब तक बनी हुई हैं। शिक्षकों के मध्य मैं एक सर्वप्रिय व मेधावी छात्रा के रूप में जानी जाती थी। मैने दसवीं एवं बारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की एवं बारहवीं पास करने के एक ही वर्ष पश्चात मेरा विवाह हुआ और मैं अपने गृह जनपद भदोही में ही स्थित अपने ससुराल आ गई। ससुराल में ही रहकर मैने ज्ञानपुर स्थित काशी नरेश स्नातकोत्तर महाविद्यालय से क्रमश B.com एवं M.com की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। तदोपरान्त वर्ष1998 बैच का बी टी सी का प्रशिक्षण वर्ष 2000 में राजकीय दीक्षा विद्यालय ज्ञानपुर से प्राप्त कर वर्ष 2002 में बेसिक शिक्षक के तौर पर जनपद में नियुक्त हुई।
💐स्वयं के जीवन के संघर्ष एवं सफलताएं:- मेरा जीवन निरंतर नित नई चुनौतियों व संघर्षों की अनवरत यात्रा रहा है।जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिए के चलते ही मैं हर चुनौती का सहर्ष सामना करने एवं विपरीत परिस्थितियों में भी सहज राह ढूंढ लेने के योग्य बन सकी हूँ।मशहूर शायर निदा फाजली की गज़ल की इन पंक्तियों को मैने सदैव अपने जीवन का दर्शन बनाया है..
अपना गम ले के कहीं और न जाया जाए।
घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए।।
बारहवीं की शिक्षा के बाद एक बड़े शहर के शिक्षित एवं खुले परिवेश से निकलकर वर्ष 1996 में मेरा पूर्वांचल के एक बेहद पिछड़े ग्रामीण एवं अशिक्षित परिवेश में नववधु के रूप में आगमन हुआ। कुछ ही दिनों बाद मुझे बखूबी अहसास हो गया कि आत्मनिर्भरता एवं शिक्षा ही एकमात्र ऐसी मशाल होगी जो कि भविष्य में मेरे जीवन के अंधेरों की राह रौशन कर सकेगी। उन दिनों नितांत ग्रामीण परिवेश से घूंघट में लिपटी एक नवविवाहित वधू का आगे की पढ़ाई के इरादे से कदम बढ़ाते हुए प्रतिदिन चार किलोमीटर डिग्री कॉलेज की ओर जाने व आने का वो सफ़र उस पूरे गांव की बालिकाओं एवं महिलाओं के लिए एक बड़े सामाजिक बदलाव का सफ़र सिद्ध हुआ। शुरुआत में तो घर के भीतर और बाहर भी कभी प्रबल विरोध तो कभी छुटपुट विरोध स्वर उठते रहे, किंतु पतिदेव ने हर कदम पर साथ दिया।उन दिनों ग्रामवासियों के लिए ये अजूबे जैसा था कि गांव की एक नवांगतुक बहु कंठ के नीचे तक एक फिट का घूंघट काढ़े,ग्रामीण बालिकाओं को साथ लिए पैदल ही आत्मविश्वास की डोर थामे महाविद्यालय की ओर कदम बढ़ाती चली हैं। ग्रामीण महिलाएं अक्सर ही छत पर खड़ी होकर कौतूहल एवं आश्चर्यमिश्रित नजरों से यह दृश्य देखा करती थी। धीरे-धीरे मैने गांव की कुछ बुजुर्ग रूढ़िवादी महिलाओं से संपर्क कर उन्हें विश्वास में लिया और शिक्षा के महत्व से अवगत कराकर प्रेरित किया कि वे भी अपने घर की बालिकाओं एवं बहुओं को आगे की पढ़ाई शुरू करने की इजाजत दें। यद्यपि पितृसत्तात्मक रूढ़िवादी सोच में ये बदलाव करना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था, किंतु चार पांच वर्षों के निरन्तर प्रयत्न के बाद उनका विश्वास जीतकर मैं काफ़ी हद तक इस उद्देश्य सफल रही।इसी बीच पढ़ाई के साथ साथ घरेलू जिम्मेदारियों को निपटाते हुए मैने ग्रामीण बच्चों को अपने घर पर ही एकत्रित करके पढ़ाना प्रारंभ किया। ग्रामीण महिलाएं, अपनी बालिकाओं की शिक्षा में भी उतनी ही रुचि लें इस उद्देश्य से प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर घर में बैठी लड़कियों के लिए स्वयं अपने ग्रामीण आवास पर सिलाई बुनाई और कुकिंग की कक्षाएं लगानी शुरू की और जब इस बहाने बच्चियों को मेरे पास आने का अवसर व अनुमति मिलने लगी तब मैंने उसी बीच वक्त निकालकर उन्हें पढ़ाना भी शुरू किया,और फिर अभिभावकों को विश्वास में लेकर उनका पुनः पास ही के इंटर कॉलेज में प्रवेश दिलाने में सफलता प्राप्त की। आज कई बालक बालिकाएं मेरे इन प्रयासों से शिक्षित होकर आत्मनिर्भर बन सकी हैं जो मेरे लिए असीम संतोष का विषय है।
💐कार्यक्षेत्र की उपलब्धियां: - ग्रामीण स्तर पर शिक्षण कार्य करते हुए मैने पाया है कि यहाँ दोहरे मोर्चे पर काम करने की आवश्यकता है।छात्र व अभिभावक दोनो ही के स्तर पर जागरूकता लानी होगी।जहां तक बच्चों की बात है,उनके बौद्धिक स्तर को देखते हुए मैने शिक्षा में कई नवाचार किए हैं। जैसे-Me and My Friend....संदेशे आते हैं....समूह जीवन..बन्द लिफाफ़ा.....knock knock ...इत्यादि मेरे सफ़ल नवाचार हैं। वहीं अभिभावकों के लिए.. हेलो मम्मी..पापा जल्दी स्कूल आना इत्यादि नवाचारों के माध्यम से विद्यालय से समुदाय को जोड़ने का प्रयास किया।
कार्यक्षेत्र में ऐसे ही एक नवाचार का किस्सा वर्तमान विद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने के कुछ माह बाद का है। इस स्कूल में ज्यादातर बच्चे अनुसूचित जाति से आते थे,जिनके अभिभावक दिहाड़ी मजदूरी पर जीवन यापन करनेवाले लोग थे।प्रायः धान व गेंहूँ की कटाई के दौरान इन बच्चों को उनके अभिभावक, मजदूरी में सहयोग करने के इरादे से घर पर रोक लिया करते थे और स्कूल में बच्चों की उपस्थिति का प्रतिशत बुरी तरह घटकर बीस तीस प्रतिशत तक सिमट जाता था।कक्षाओं में भी बच्चे अपने उन दोस्तों को काफ़ी मिस करते और घर बैठ जाने से ऐसे बच्चों का पठन पाठन भी बुरी तरह प्रभावित होता था।अभिभावको से बात करके कोई खास फायदा समझ ना आता, क्योंकि वे रोज की 5kg की चावल और गेहूँ की मजदूरी खोने को तैयार ही ना होते। शिक्षा उनकी वरीयता क्रम में इस मजदूरी से नीचे आती थी और शायद उनमे से कुछ बच्चों को भी अपनी पढ़ाई नीरस और उबाऊ लगती थी, क्योकिं कटाई से प्राप्त मजदूरी छोड़कर वे स्कूल आना चुनना नही चाहते थे। इस तरह स्कूल उन्हें उन्मुक्त खेतों से अपनी ओर खींच पाने में असमर्थ सा लग रहा था। अक्सर क्लासरूम में मौजूद बचे खुचे बच्चों के साथ मैं इस बारे में बातें करती कि कैसे इन बच्चों को स्कूल बुलाया जाय। कई सारी युक्तियाँ अपनाई गई पर उतनी कारगर साबित ना हुई। फिर एक नन्हे छात्र ने मजेदार आइडिया दिया। मैं घर से दो बड़े बड़े म्यूज़िक स्पीकर उठा लायी और स्कूल की छत पर रखवा दिया। जैसे ही हम लोग अनुपस्थित बच्चों को आसपास के खेतों में, या रास्ते से गुजरते हुए देखते तो फुल वॉल्यूम में गाना चला देते....संदेशें आते हैं.हमें तड़पाते हैं... या फिर आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ एक ऐसे गगन के तले..या उस समय का कोई प्रसिद्ध भोजपुरी गीत चला देते जैसे कि..ही ही ही हँस देहनी चिंकीया के पापा..स्कूल में उपस्थित बच्चे पतंगी कागजों की रंग बिरंगी टोपियाँ पहनकर जान बुझकर स्कूल गेट के आसपास डांस करते, जिसे देखकर बच्चों संग अभिभावक भी खींचें चले आते,और फिर हम सभी उनसे निवेदन करते कि कोई बीच का रास्ता खोजें और अपने बच्चों को दिहाड़ी मजदूरी के काम में ना लगाकर स्कूल भेजें।इस कोशिश के सकारात्मक नतीजे हाँसिल हुए,बच्चों का भी स्कूल की ओर आकर्षण बढ़ा, जिससे उनकी उपस्थिति का प्रतिशत भी धीरे धीरे बढ़ने लगा। फिर मैनें इस आईडिया को अन्य स्कूलों के साथ भी साझा किया और बेहतर नतीजे सुने। मैने देखा कि किसी नन्हें मुन्ने छात्र के मस्तिष्क में कौंधा एक विचार भी धरातल पर कितना परिवर्तनकारी सिद्ध हो सकता है अतः एक शिक्षक को सिर्फ सीखाने के लिए ही नहीं बल्कि किसी से भी सकारात्मक सीखने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। मैं अपने पुरातन छात्र छात्राओं के संपर्क में भी रहती हूँ एवं आवश्यकतानुसार उनकी काउंसलिंग भी किया करती हूँ। प्रायः जब मेरे प्रेरित करने पर भी कोई पुरुष या महिला अब अपनी पढ़ाई लिखाई की उम्र निकल जाने की बात करता है तो मैं स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्हें बताती हूँ कि किस प्रकार चालीस वर्ष की आयु में सेल्फ स्टडी करके मैने लोक सेवा आयोग की परीक्षा का प्रथम प्रयास दिया एवं प्रवर अधीनस्थ सेवा के साक्षात्कार चरण तक पहुंचने में सफल भी रही।मेरा पुरातन छात्रों को सदैव यही संदेश रहता है कि जीवन में शिक्षा प्राप्त करने या ज्ञानवृद्धि की कोई उम्र नहीं है। आप जब भी चाहें प्रयास कर सकते हैं। शिक्षा आपको सदैव आत्मसंतोष एवं प्रबोधन की ओर ले जाने का कार्य करती हैं।
आज मुझे लगता है कि मैं एक बेहतरीन पेशे में हूँ। एक शिक्षक होने के तौर पर आत्मसंतोष के भाव से भरी रहती हूँ। मुझे गर्व हैं कि मैं उस प्रमुख कड़ी से जुड़ी हूँ जिसमें भविष्य का वास्तविक भारत बसता है और विकास की अगली कड़ी से जुड़ता है। मैं इस बन्धुत्व का हिस्सा हूँ और इस बात के लिये स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती हूँ।
💐स्वयं की उपलब्धि:- बच्चों के नामांकन,ठहराव एवं विभिन्न नवाचारों के लिए उप जिलाधिकारी महोदय द्वारा प्रमाणपत्र प्रदान किया गया।
💐मिशन शिक्षण संवाद के लिए संदेश:- यह मंच शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित एक बेहतरीन प्रयास है।मिशन शिक्षण संवाद के अंतर्गत उपलब्ध समस्त सामग्रियां छात्रों के लिए अत्यंत उपयोगी होती हैं एवं साथ ही साथ यह शिक्षकों के लिए भी उतनी है सहायक है।इस मंच से जुड़े शिक्षकों द्वारा अपना अमूल्य योगदान देकर इसे नित नई ऊंचाईयों पर पहुंचाने का निरंतर प्रयास जारी है।आदरणीय विमल सर द्वारा महिलाओं के लिए उपलब्ध कराए गए शक्ति संवाद मंच की जितनी ही प्रशंसा की जाए, कम होगी।यह मंच महिलाओं को उनके अनुभव समाज हित में साझा करने एवं एक बड़े शिक्षित तबके से उन्हें जोड़ने का सुअवसर प्रदान करता है।
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_✏संकलन_
ज्योति कुमारी(शक्ति संवाद)
*📝टीम मिशन शिक्षण संवाद।*
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