91/2025, बाल कहानी- 02 जुलाई
बाल कहानी - सन्यास आश्रम (भाग- 1)
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महात्मा बुद्ध का शिष्य आनन्द बुद्ध को बहुत परेशान करता रहता था। यह उसकी निश्चलता और सहजता थी, जो सहज रुप से स्वभाव के अनुसार प्रवाहित होती रहती थी। बुद्ध इसे भली-भाँति समझते थे। वह आनन्द की बात का कोई बुरा नहीं मानते थे क्योंकि उन्हें उसका भविष्य ज्ञात था। आनन्द उनका अत्यन्त लाड़ला और प्यारा शिष्य था। बुद्ध ने उसे वचन दिया था कि यदि उसने बुद्धत्व की अनुभूति कर ली तो वह उसे हमेशा हर घड़ी अपने साथ रहने देंगे। उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध कभी अपने से दूर नहीं करेंगे। इसी कारण आनन्द बुद्ध से तरह-तरह के प्रश्न पूछा करता था और कहीं से कोई सूक्ष्म राह, अदृश्य मार्ग ढूँढ़ने का प्रयास करता रहता था। वह जानता था कि वह बुद्धत्व पा लेगा। वह दृढ़ निश्चयी और दृढ़ संकल्पी तथा अटल विश्वासी और प्रेमपूर्ण था। सभी के सामने बच्चों-सी चंचलता का प्रदर्शन उसका सबके सामने अपना चुनाव था, जैसे कोई रंगमंच पर अपना अभिनय चुनता है और उसको निभाता है। बस! उसका जीवन अभिनय और साक्षी-भाव तक रह गया था, जहाँ से वह स्वयं को जब चाहे देख सकता है। वह मन में विचारों के झंझावातों को रोज उठता देखता और बस! देखता रहता, जब-तक वह जा न चुके हों। विचारों के जाने पर वह शान्त और शून्य हो जाता था, लेकिन विचारों का आना-जाना अभी भी लगा रहता था। इसी से वह परेशान रहता था।
एक दिन आनन्द ने बुद्ध से कहा कि, "अरिहन्त! मैं कब तक विचारों में उलझा रहूँगा?" बुद्ध ने कहा, "अभी तुम्हें तुम्हारे विचारों से मुक्ति का समय नहीं आया है।"
"क्यों?"
"ताकि तुम हर पल अभी मेरे साथ न रह सको!" बुद्ध मुस्कराये। आनन्द बोला, "नहीं प्रभु! बात को टालिये मत! मैं सच में ही अभी विचारों से मुक्त होना चाहता हूँ।"
"ठीक है। उससे पहले तुम्हें मेरा एक काम करना होगा। इस सन्यास आश्रम के बाहर कुछ दूर पर जो सरिता बहती है, वहाँ जाकर पहले मेरे लिए शुद्ध और स्वच्छ, मीठा जल लाओ! मुझे बहुत प्यास लगी है।" बुद्ध ने अर्थपूर्ण दृष्टि से चमकते हुए नेत्रों से रहस्यमयी मुस्कान लिए उसकी ओर देखा। "जी, गुरुदेव!" कहकर आनन्द वहाँ से बुद्ध के लिए जल भरने चल दिया।
आनन्द जैसे ही स्वभाववश जल्दी-जल्दी सरिता की ओर बढ़ा, बुद्ध आँखें बन्द कर ध्यानस्थ हो गये। आनन्द जैसे ही नदी के किनारे पहुँचा तो शीघ्र ही जल भरने के लिए घड़ा नीचे नदी की धार पर किया तो चौंक पड़ा। नदी का जल बहुत अधिक मैला था। आनन्द सोचने लगा, "मैं कब तक प्रतीक्षा करुँगा? नदी का जल तो बहुत मैला और गन्दा है। इसे स्वच्छ होने में बहुत अधिक समय लगेगा। बुद्ध को तो बहुत अधिक प्यास लगी है। उन तक जल शीघ्र पहुँचना चाहिए। चलो, कहीं और आश्रम के समीप से जल की व्यवस्था करता हूँ।" यह सोचकर आनन्द घड़ा लिए वापस आश्रम की ओर लौट पड़ा।
आश्रम लौटते ही उसने बुद्ध से कहा कि, "प्रभु! जल नहीं ला पाया। सरिता का जल बहुत मैला और गन्दा था। पीने योग्य नहीं था।"
"तुम्हें प्रतीक्षा करनी चाहिए थी...।"
"प्रतीक्षा...?"
"हाँ! जाओ और प्रतीक्षा करो, बैठो और देखो!...जाओ!"
आनन्द बिना मन के वापस नदी की ओर लौट पड़ा। नदी से बहता हुआ जल अभी भी मैला ही था। आनन्द वहीं किनारे बैठकर प्रतीक्षा करने लगा। समय गुजर रहा था, लेकिन आनन्द बहुत बैचेन और परेशान था। वह सोचता था कि, "कब नदी का जल साफ हो और मैं गुरुजी के लिए जल लेकर पहुँच जाऊँ?" प्रतीक्षा करने के अलावा उसके पास कोई उपाय न था।
#संस्कार_सन्देश -
हमें किसी भी कार्य के लिए गुरु-वचनों पर विश्वास करना चाहिए और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना चाहिए।
कहानीकार-
#जुगल_किशोर_त्रिपाठी
प्रा० वि० बम्हौरी (कम्पोजिट)
मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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