पृथ्वी दिवस
सोचो ..
कैसा मंजर होगा;
न छाँव होगा, न पानी;
हर तरफ बस होगी तबाही,
त्राहि- त्राहि करेगा हर एक प्राणी।
अपने लालच में हमने,
दिया सब कुछ गवां.
नदियों को दूषित कर,
हवा में दिया विष मिला।
हरियाली की चादर जो,
धरती ने थी ओढ़ी ..
विकास के नाम पे तुमने,
उसको बंजर कर डाला।
धरती तो सदा ही ,
बस देने पर थी तत्पर..
पर देखो न आज
वो तप रही है हर पल।
दूर नहीं है समय वो,
जब मानव पछताएगा;
धरती माँ के क्रोध में,
सब कुछ मिट जाएगा।
अभी भी वक्त है,
तुम लोग ज़रा सँभल जाओ;
अपनी अगली पीढ़ी के खातिर,
धरती माँ को बचाओ।
रचयिता
हिना सिद्दीकी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय कुंजलगढ़,
विकास खण्ड-कैंपियरगंज,
जनपद-गोरखपुर।

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