69/2025, बाल कहानी- 23 अप्रैल


बाल कहानी - बन्दर और गौरैया
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एक बार की बात है, एक बन्दर शहर घूमने निकला। उसने शहर के बारे में बहुत सुन रखा था। ऊँची-ऊँची इमारतों पर से छलाँग लगाने में उसे बहुत मजा आ रहा था। उछलते-कूदते वह थक गया। अब उसे भूख भी लग रही थी। पर यहाँ तो न आम के पेड़ थे, न ही जामुन के। 
तभी एक घर के पास उसे एक गौरैया दिखाई दी। गौरैया नें पूछा, "अरे बन्दर भाई! तुम यहाँ कैसे?" बन्दर बोला, "मैं तो शहर घूमने आया था। तुम तो शहर में ही रहती हो। तुम्हें तो बहुत मजा आता होगा।" गौरैया उदास होकर बोली, "अरे बन्दर भाई! शहर की बात मत पूछो! सारे पेड़ कटते जा रहे हैं। न हमारे रहने की जगह बची है, न घोंसला बनाने की। कितने पंछी तो भूख और प्यास से मर गए। हमारी संख्या भी बहुत कम हो गई है। बड़ी मुश्किल से मैनें इस घर के रोशनदान में अपना घोंसला बनाया था। घर की रंगाई-पुताई करने वालों ने वो भी नष्ट कर दिया। अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं कहाँ जाऊँ?"
बन्दर बोला, "चिन्ता मत करो, गौरैया बहन! तुम मेरे साथ मेरे गाँव चलो, वहाँ तो बहुत सारे पेड़ हैं। पास ही सुन्दर-सा तालाब भी है। वहाँ तुम्हें भोजन भी आसानी से मिल जाएगा और ठण्डा मीठा पानी भी । वहाँ तुम्हें बहुत से दोस्त मिल जाएँगे। वहाँ तुम अपना घोंसला बनाकर आराम से रहना। मुझे भी बहुत भूख लगी है। चलो, यहाँ से चलते हैं। मेरा हरा-भरा गाँव बहुत अच्छा है, तुम्हें जरूर पसन्द आएगा। फिर दोनों चल दिए गाँव की ओर।

#संस्कार_सन्देश -
हमें अधिकाधिक संख्या में वृक्ष लगाने चाहिए ताकि वन्य जीव सुरक्षित रह सकें।

कहानीकार-
#शालिनी_श्रीवास्तव 'सनशाइन' (स०अ०)
पी० एम० श्री गुलहरिया,भटहट 
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद 
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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