71/2025, बाल कहानी- 25 अप्रैल
बाल कहानी - समझ
---------------------
किसी गाँव में सुरेखा अपनी लड़की राधा और पुत्र विभव के साथ रहती थी। उसके घर के आगे एक छोटी-सी बगिया थी, जिसमें फलदार वृक्ष लगे थे। कुछ फूलों वाली लताएँ भी उसके घर के द्वार की शोभा बढ़ा रही थीं। घर के द्वार के दोनों ओर अशोक और आँवला के वृक्ष प्रहरी की भाँति खड़े थे। इससे सुरेखा के घर पर वृक्षों की छाया बनी रहती थी, जिससे गर्मियों में घर में शीतलता बनी रहती थी। उसके दोनों बच्चे बहुत ही खुश रहते थे। सुरेखा के अनेक बकरियाँ थीं। वह उनको चराने के लिए खेतों में ले जाती। उसकी बच्ची घर का काम करती और खाना बनाती, जिसके कारण वह स्कूल नहीं जा पाती थी। विभव कक्षा पाँच में पढ़ता, जबकि राधा विभव से बड़ी थी।
'जल जीवन मिशन' के तहत उसके घर के द्वार पर नल लग गया था, जिससे उन्हें अब पानी के लिए परेशान नहीं होना पड़ता। सुरेखा को वृद्धावस्था पेंशन मिलती थी। राशन भी उसे मुफ्त में मिलता था। पिछले वर्ष उसका आवास भी बन गया था। इतने पर वह बकरियों का दूध बेचती और बकरियों को बड़े होने पर बेचती, जिससे उसका खर्च सुगमता से चल जाता था। उसकी पाँच बीघा जमीन भी थी, जिस पर वह गेहूँ और मटर-चना की खेती करती। गाँव के बाहर उसका एक बेड़ा था, जिसमें वह नल लग जाने से वहाँ सब्जियों की खेती करने लगी। अब वह बाजार में सब्जियाँ भी बेचती और अतिरिक्त आमदनी प्राप्त करती। सिर्फ एक कमी उसे खलती रहती कि वह अपनी बेटी राधा को नहीं पढ़ा सकी।
एक दिन राधा ने सबके लिए पकौड़े बनाये। वह घर के अन्य कामों में व्यस्त हो गयी। माँ-बेटे बाहर नल से पानी भर रहे थे, तभी एक बकरी ने रसोईघर में घुसकर सारे पकोड़े खा लिए। विभव को बहुत क्रोध आया। उसने बकरी को तीन-चार डण्डे मार दिए। बकरी कराह कर में-में करती हुई पाँव फैलाकर नीचे बैठ गयी। वह उठ नहीं पा रही थी। राधा और सुरेखा ने विभव को दूर हटाकर उसे डाँटा और कहा कि, "विभव! तुम्हें शर्म नहीं आती? यह मूक जानवर है, बोल नहीं सकता। उसके भी खाने की इच्छा हुई, उसने खा लिया। इसमें बुरा क्या है? पकोड़े फिर बन जायेंगे। बकरी को बहुत चोट लगी है, वह उठ नहीं पा रही है। जाओ, डाॅक्टर को बुलाओ, उसका इलाज कराओ!" यह सुनकर विभव घबड़ा गया। वह डाॅक्टर को बुला लाया और बकरी का इलाज कराया। डाॅक्टर के जाने के बाद सुरेखा ने कहा, "विभव! बकरी अपनी है। पकोड़े अपने थे, फिर क्यों तूने ऐसा किया? अब देख, कितने पैसे उसके इलाज पर खर्च हो गये। मैं कितनी मेहनत से कमाती हूँ। तुझको धैर्य रखना चाहिए था। रसोईघर का द्वार खुला हुआ था। बकरी चली गयी और पकोड़े खा गयी, इसमें बकरी का क्या दोष है? सभी जानवरों का यही स्वभाव है। लेकिन तूने अपने स्वभाव से हटकर कार्य किया है। यह गलत है।" विभव को अपनी गलती का आभास हुआ, उसने कहा, "माँ! मुझसे गलती हो गई। मैं आज के बाद ऐसा कभी नहीं करुँगा। माँ! मुझे माफ कर दो!"
"ठीक है।" कहकर माँ ने उसे माफ कर दिया।
"माँ! एक बात कहूँ, तुम मानोगी?"
"हाँ, बेटा! बोल, क्या बात है?'"
"माँ! घर पर किसी अध्यापक को बुलाकर राधा दीदी को पढ़ाने-लिखाने की व्यवस्था करो, मैंने किसी को कहते सुना है कि जो लड़की पढ़ी-लिखी नहीं होती, उसकी शादी में बहुत दिक्कतें आती हैं। उसका स्कूल में नाम भी लिखा दो और घर पर वह पढ़ती रहेगी। फिर होशियार होने पर उसका नाम योग्यता के आधार पर चार या पाँच में लिख जायेगा।" विभव ने कहा।
माँ ने कहा, "क्या ऐसा हो सकता है? ये तो अच्छी बात है। मैं ऐसा ही करुँगी।" माँ की बात सुनकर राधा बहुत खुश हुई।
#संस्कार_सन्देश -
हमें पशु-पक्षियों पर दया-भाव रखकर उनका ध्यान रखना चाहिए। साथ ही शिक्षा का महत्व जरूर समझना चाहिए।
कहानीकार-
#अंकिता (कक्षा-5)
प्रा० वि० बम्हौरी (कम्पोजिट)
मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
Comments
Post a Comment