हार नहीं मानूँगी
संकल्प लेती हूँ हार नहीं मानूँगी,
जीवन के पथ का मैं हार बन जाऊँगी।
रोशनी को कर दूँगी दीपन को मजबूर,
बेशक अति तम है, पर पार कर जाऊँगी।।
भूल गया 'वो' शायद खुशियाँ उपहार की,
जो जन्म देने देता है साथ में।
शायद उसी ने लिखा ना, मुझे जान,
बनकर विधाता खुद भाग लिख जाऊँगी।।
तन में भी पीड़ा है, मन भी अति त्रस्त है,
जानती हूँ आसान जीना नहीं है।
मेरी भी छोटी सी दुनिया है यारो,
सपने हूँ पालती, मैं क्षार नहीं बोऊँगी।।
कहने को ही केवल, जन्मती अकेली हूँ,
कितनों को जीवन भर नेह कर पालती।
धरती सी हूँ, पीर पर्वत बन टालती हूँ,
कितनों को जन्म और पाल कर जाऊँगी।।
दुष्कर है पथ और दुर्गम है मंजिल तो,
मेहनत का स्वेद सींच बसंत खिलाऊँगी।
हार जाएगा वो विधाता वियोग लिख,
मैं तो संयोग की 'संगी' ही बन जाऊँगी।।
रचयिता
संगीता बहुगुणा,
प्रधानाध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय जलगाँव,
विकास क्षेत्र-कर्णप्रयाग,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

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