इक ख्वाहिश
इक है बगिया बेसिक की
हम ही जड़ हैं, हम ही मिट्टी
ऐसा सींचो ऐसा पोसो
देखो फसल बर्बाद न हो जाए
ऊबड़- खाबड़ डगर ये अपनी
नित नये प्रयोजन से
कोशिश है होती
कहीं तो रास्ता सरल सपाट बन जाए
एक से बढ़कर एक नगीने
मेरे कुनबे में निखरें
अपनी चमक बनाये रखना यारो
सस्ता बाज़ार हाट न बन जाए
मैं तुझसे और तू हो मुझसे
तू आगे तो मैं पीछे तुझसे
प्रतिस्पर्धा प्रतिस्पर्धा ही रहे
गलाकाट न बन जाए
गलाकाट न बन जाए

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ👌👌
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