बाल व्यथा
सोचा था पढ़ लिखकर, पापा तुम्हारा नाम करूँगा।
मगर न सोचा था कि नन्हें हाथों से खेत में काम करूँगा।
सोचा था पढ़ लिखकर मम्मी तुम्हारा नाम करूँगी।
मगर न सोचा था कि नन्हें हाथों से चौका- चूल्हा करूँगी।
सोचा था पढ़ लिखकर मैडम तुम्हारा नाम करूँगी।
मगर न सोचा था मैडम, घर से स्कूल ही न भेजी जाऊँगी।
सोचा था सर जी, पढ़ लिखकर तुम्हारा नाम करूँगी।
पर न सोचा था सर जी, नन्हीं सी उम्र में ब्याह दी जाऊँगी।
सोचा था सखियों, पढ़ लिखकर हम सब देश का नाम करेंगे।
पर न सोचा था बहनों, सपनों को मार जिंदा लाश हो जाएँगे।
जागो मम्मी जागो पापा, नहीं माँगते तुमसे हम ज्यादा।
भेज दो पढ़ने रोजाना, न कराओ हमसे मेहनताना।
जागो बहना, जागो भैया, आजाद देश के है हम वासी।
नहीं मिली मुझे अभी तक, दिला दो मुझको भी असली आजादी।
रचयिता
शुचिता शर्मा,
सहायक अध्यापिका,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय मदारपुर,
विकास खण्ड-परसेंडी,
जनपद-सीतापुर।

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