हम हितैषी गाँव के

तुम भी लिखो मैं भी लिखती हूँ
चंद पंक्तियाँ गाँव पे।
कुछ तुम जताओ
कुछ मैं जताऊँ
दर्द उजड़े खलिहान पे।
खूब करें चर्चा आओ हम
बिखरे घर और गाँव पे।
तुम भी लिखो मैं भी लिखती हूँ
चंद पंक्तियाँ गाँव पे।

कैसे रहते चंद बुजुर्ग वहाँ पर
जीवन के सन्ध्या काल में।
क्या जरूरत जाकर देखें
जी रहे किस हाल में।
लाठी टेक चलती है कैसे
दादी घुटने थाम के।
अपनापन दिखाती गाय,
देख दादी को, रम्भा के।
तुम भी लिखो मैं भी लिखती हूँ
चंद पंक्तियाँ गाँव पे।

न तू चाहता है न मैं चाहती हूँ
जाकर बसना गाँव में।
शब्दों से भर दें आओ
खाली घर हम गाँव के।
कविता से घर सवारें
लेखों से सजायें आँगन।
पकड़ कागज कलम
हम अपना कर्तव्य निभा दें
तुम भी लिखो मैं भी लिखूँ
चंद पंक्तियाँ गाँव पे।

शब्दों की शीतल बारिश से
बंजर खेतों को लहलहा दें।
क्यों सिसकती पीपल की छाँव।
क्या जरूरत कारण जाने।
क्यों हम निवारण की ठाने
आओ लटकाएँ शब्दों के मोती।
हम हितैषी गाँव के
तुम भी लिखो मैं भी लिखती हूँ
चंद पंक्तियाँ गाँव पे।।।

रचयिता
अनीता ध्यानी (अनि),
प्राथमिक विद्यालय देवराना,
विकास खण्ड-यमकेश्वर,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।


Comments

  1. अतिसुन्दर👌👌👌

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  2. वाह मैम बेहतरीन सृजन ए गाँव पे,
    आओ कागज का घोड़ा दौड़ाएं हम,
    लगाम-लेखनी अपनी हम थाम के,
    डूबते को पार लगादें हम कागज के नाव पे।

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