बच्चे

बच्चे दरअसल
इतने मासूम
नहीं होते
जितना हम
उन्हें समझ
लेते हैं अक्सर
बड़े होते ये समझदार

वास्तव में वो हैं देखते
हमारी हर हरकतों को
क्योंकि उन्हें है बनना
भविष्य में हम जैसा ही

हम लिख रहे या
बना रहे जैसी रूपरेखा
उन्हें फिर देना है वैसा ही

भविष्य बच्चों का जैसा
हम लिखते हैं
हमे देते वो वैसा
भविष्य हमारा भी

आज वो हम पर है निर्भर
कल होना है               
हमें उन पर निर्भर ही

अभिभावक हो या शिक्षक हो
तय कर हम फिर श्रेष्ठ मार्ग ही
चलना नहीं सिर्फ उनको
गुजरना है कल हमको भी

रचयिता
डाॅ0 अनीता मुदगल,
प्रधानाध्यापिका,
श्री श्रद्धानंद प्राथमिक विद्यालय,
नगर क्षेत्र-मथुरा,
जनपद-मथुरा।

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