हम मुफ्त के चाहने वाले हैं

हवा बह रही, कहाँ से कैसे?
हम नहीं सोचने वाले हैं।
शुद्ध साँस-सुगन्ध मिले हमको,
न कुछ और जानने वाले हैं।
हम मुफ्त के चाहने वाले हैं।।

शुष्क विपिन पतझड़ में जब।
नहीं, जैविक खाद जानने वाले हैं,
भूस-पराली जलाने वाले हम,
धुँध-कोहरे की क्या जाने?
हम शुद्ध समीर चाहने वाले हैं।।

रोपी न कभी इक पौध कहीं,
रोका न विपिन, दावानल से।
सींची न कभी इक बूँद धरा,
पावन नीर चाहने वाले हैं।
हम मुफ्त के चाहने वाले हैं।।

जाना न कभी क्या धान अर जौ,
कैसे तिलहनी बीज से तेल मिले?
किसान-किसानी की जाने नहीं हम,
 झूठन कर फेंकने वाले हैं।
हम मुफ्त के चाहने वाले हैं।।

पनपने न दिया, कोख लाड़िली को।
पढ़ाय, बढ़ाया न ब्याठुळि को।
पर मेहनत के बल से हम तो,
घर, उजियारि तलाशने वाले हैं।
हम मुफ्त के चाहने वाले हैं।।

कर्त्तव्य किया कितना माह भर?
नहीं सोच, पगार को चाहते हैं।
विकास की क्यों परिभाषा सुनें?
हम वोट चाहने वाले हैं।
हम मुफ्त के चाहने वाले हैं।।

रहते मन-वाणी से पाछे सदा,
जो जीते हैं झूठ की शान यहाँ।
सबूत सत्कर्म, न शर्म कोई,
सफलता, शिखर बोलने वाले हैं।
हम मुफ्त के चाहने वाले हैं।।

रचयिता
दिनेश कुमार सोनी,
सहायक अध्यापक,
रा०पू०मा०वि०सिसई, 
विकास खण्ड-बीरोंखाल,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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