आनंदमयी स्कूल

एक समय था, जब मैं सोचता था,
स्कूल, स्कूल नहीं ये कैदखाना है।
और टीचर गुरु नहीं, हैं वो  जेलर,
स्कूल की दीवारों पर पसरा मौन है।

पर मन चिल्लाता था, बाहर निकलने को,
कैद से छूटने को, खुले में खेलने को।
बेफिक्र दौड़ने को, किलकारी मारने को,
आज का समय है, सोच बदलने को।

आज स्कूल आनंद घर ही तो है,
प्यार, मौज, मस्ती में सीखने का घर।
जहाँ न कोई डाँट है, ना ही कोई डर,
टीचर मित्रवत, पढ़ने में न कोई झिझक।।

आज मैं भी अध्यापक सहज हूँ,
बचपन मेरे अंतर्मन में बसा है।
मेरे बचपन की यादों को मेरा मन,
कब से इन बच्चों में से ढूँढता है।।

सोचूँ उन्हें कभी स्कूल जेल ना लगे,
और मुझे एक जेलर न वो समझें।
बल्कि उन्हें ये अपना  घर सा लगे,
सीखने पढ़ने का आनंदमय माहौल मिले।।

रचयिता
हरीश चंद्र सिंह 'रजवार',
सहायक अध्यापक, 
राजकीय प्राथमिक विद्यालय चम्याडीगांजा,
विकास खण्ड-स्याल्दे, 
जनपद-अल्मोड़ा,
उत्तराखण्ड।

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