बापू हमारे

2 अक्टूबर अट्ठारह सौ 69 गुजरात का छोटा सा ग्राम,
पितु करमचंद, माँ थी पुतली, बाहर छिड़ा हुआ संग्राम।
भारत की स्वतंत्रता में, भाग बढ़ चढ़कर लिया,
हाथ लाठी, तन में लंगोटी, कमर घड़ी लटकाया।
हिंसा से परहेज कर, बात अहिंसा की ही करे,
सत्याग्रह का पाठ पढ़ा, जनांदोलन खूब किये।
प्यार से सब 'बापू' कहते, 'बापू' सा सम्मान किया,
कस्तूरबा ने संगिनी बन साथ उनका खूब दिया।
'असहयोग आंदोलन' कर, 'भारत छोड़ो' का नारा दिया,
'सविनय अवज्ञा' आंदोलन से, अंग्रेजों को परास्त किया।
'दांडी यात्रा' करके 'नमक आंदोलन' में सहयोग दिया,
बड़े-बड़े नेताओं के संग, जेलों का फिर सफर किया।
सत्यवादी रहे सदा ही, 'अहिंसा-परमो-धर्म:' का  दिया उपदेश,
छुआछूत मिटा कर जग से, ऊँच-नीच का, रखा ना कोई भेद।
अस्त्र विहीन रह जग को, दिया हमेशा शांति पाठ,
ऐसे थे 'महात्मा गांधी' जन-जन करता उनको याद।
30 जनवरी 'प्रार्थना स्थल' पर, पहुँच गए थे नाथूराम,
गोली मार हत्या कर डाली, बापू कहते - हाय! राम।

रचयिता
सुनीता बहुगुणा,
सहायक अध्यापक,
राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय बिजनी बड़ी,
विकास क्षेत्र - यमकेश्वर,
जनपद - पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।


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