नारी क्यों हारी

मन का आँगन क्रन्दित है
तन ने अथाह वेदना झेली
शर्मसार आज मानवता हुई
नर पिशाच ने खेली ऐसी होली।

माँ  की  ममता  की  नैया
करुण क्रन्दन के गहरे समन्दर।
भटक  रही इधर-उधर बेबस,
चट्टानों  से  टकरा -टकरा कर।

बेटी होना  इतना  पाप  है
क्या  जग  का यही सन्ताप?
क्यूँ हर बेटी कुपित है आज,
खुद का जन्म समझ रही पाप।

सपनों  के  तेरे  भी  महल,
घर आँगन के  सजते  होंगे।
पढ़ लिखकर सफलता के,
गगन उड़ने को आतुर रहे होंगे।

पिता का अभिमान, माँ का स्नेह,
तुझमे भी  रचता -बसता होगा।
हाय, कैसे  निर्मम  हत्यारों  ने
तिनका-तिनका उजाड़ा होगा।

दया-धर्म  को  छोड़कर
दानवता का प्रचंड दिखाया।
जन्म  दिया  जिस  माता  ने
कोख को उसकी कलंकित किया।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ
ना ही बेटी दिवस मनाओ।
बेटियों  की  रक्षा  के  लिए
फाँसी की सजा का एलान कराओ।

रचयिता
सन्नू नेगी,
सहायक अध्यापक,
रा0 उ0 प्रा0 वि0 सिदोली,
विकास खण्ड-कर्णप्रयाग, 
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

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