बेटी
सामाजिक बन्धन के गलियारों से,
बाहर निकलना चाहती है।
रूढ़िवादिता की कन्दराओं से,
दूर निकलना चाहती है।
चार दीवारी छोड़ ,
नीला आकाश देखना चाहती है।
आसमान में उड़ रहे वायुयान सा,
हवा को चीर कल्पनाओं में उड़ना चाहती है।
खेल के मैदान को दूर से नही,
उसमे खड़ा होना चाहती है।
रात में तारों को देख,
ब्रह्माण्ड की कल्पना करना चाहती है।
गर्मी की चिलचिलाती दोपहर में,
तपकर झुलसना चाहती है।
सीमाओं की कल्पना नही,
डटकर दुश्मन को ललकारना चाहती है।
पवन मलय समीर बन,
खेत खलियानों में बहना चाहती है।
रोगी नही डॉक्टर बनकर,
अस्पताल जाना चाहती है।
स्कूल की घंटी सुन,
स्कूल जाना चाहती है ।
पिता के कंधे से कंधा,
मिलाकर चलना चाहती है।
भाई का,
प्रेरणास्रोत बनाना चाहती है।
माँ के आँचल का,
मान बढ़ाना चाहती है।
बेटी है जीवित रहना चाहती है,
भविष्य की धरोहर संजोना चाहती है।
आने वाले वक्त को,
सुंदर कल देना चाहती है।
उसके भी सपने हैं,
पूर्ण करना चाहती है।
नाजुक परी नहीं,
कठोर चट्टान बनाना चाहती है।
विषम परिस्थितियों में,
रणचंडी रूप रखना चाहती है।
अपनी अस्मिता के लुटेरों का,
नामो निशान मिटाना चाहती है।
दया की बैशाखी को छोड़,
हिम्मत के पहियों पर दौड़ना चाहती है
अपने बाजुओं में दम्भ भर,
खुद की तरफ उठने वाले हाथ तोड़ना चाहती है।
बेटी है उसे मौका दो
खुद को सबल बनाने का।
हिम्मत दो, आत्मविश्वास दो,
खुद का अस्तित्व बचाने का।
रचयिता
सन्नू नेगी,
सहायक अध्यापक,राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय सिदोली,
विकास खण्ड-कर्णप्रयाग,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

Very nice di💐💐🙏🙏
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर रचना
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