शिक्षक का स्वरूप
गर्व हुआ करता है जब मैं बच्ची थी।
शिक्षक में अपना रूप देखा करती थी।
शिक्षक की आन, बान, शान देखकर
खुश हुआ करती थी।
हमारी खुशी, दर्द, आँसू अपनी आँखों में दिखाया करती थी।
हमारे टिफिन में रोटी अचार देखा अगर करती थी।
कल्पना के शहर ले जाकर हलवा पूरी खिला दिया करती थी।
माँ का आँचल पिता का साया दूर हुआ करता गरीबी में कहीं,
जब प्यार से हाथ रखा ऊपर तो आँचल भी मिला
साया भी मिला शिक्षक से कहीं।
तन पर कपड़े, पेट में रोटी, भले ना हुआ करती थी।
पर शिक्षक के प्यार और दुलार से,
दोनों ही कमी दूर हुआ करती थीं।
इस स्वरूप को ही देखकर, बचपन को जीती चली गई।
पल बीता, दिन बीता, समय गुजरता चला गया।
आज वह दिन भी आ गया, जब याद आ गई।
शिक्षक का वह स्वरूप आँख में लिए, सामने नजर आ गया।
ढूँढती हूँ मैं आज उसी, बचपन को आँखों में लिए।
कहीं तो दिखेगा, किसी रूप में या किसी में।
बस सोचती हूँ उस पल को, जी लेती हूँ जिंदगी।
शिक्षक बनकर आज, खुश हो लेती हूँ बस।
प्यार भी मिल गया, दुलार भी मिल गया।
मान भी मिल गया, सम्मान भी मिल गया।
मेरी कलम जो आज इतना कुछ करती है।
कुछ और नहीं, मेरे गुरु की मेहनत दिखती है
रचयिता
राधा रैदास,
प्राथमिक शिक्षिका,
प्राथमिक विद्यालय अमाड़ी,
विकास खण्ड-बड़वारा,
जनपद-कटनी,
मध्य प्रदेश।

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