अनमोल रतन
माँ धरती ने दो अक्टूबर पर,
पाए दो अनमोल रतन।
लाल बहादुर शास्त्री जी,
और गांधी जी संग राम रटन।
सत्यवादिता, प्रेम, अहिंसा,
मेहनत और ईमान लगन।
इन दोनों के शस्त्र यही थे,
महकाया आजाद वतन।
देश की खातिर सुखों का अपने,
दोनों ने परित्याग किया।
देश की मिट्टी और कण-कण से,
दोनों ने अनुराग किया।
अंग्रेजों के जब विरुद्ध था,
बापू ने आह्वान किया।
प्रेम सहित बढ़-चढ़कर सबने,
अपना जीवन दान दिया।
देशभक्ति शास्त्री जी जैसी,
तुमने नहीं देखी होगी।
कथा सुनाऊँ तुमको उनकी,
सुनी नहीं तुमने होगी।
प्रधानमंत्री थे शास्त्री जब,
एक मित्र उनका आया।
पड़ा हुआ था संकट में,
पर कहने में कुछ सकुचाया।
माँगी उनसे अर्थ सहायता,
कुछ दिन का वादा करके।
शास्त्री जी ने किया निवेदन,
हाथ जोड़ दोनों अपने।
वेतन मैं उतना ही लेता,
जितने में है काम चले।
सबके ही ऐसा करने से,
औरों का भी पेट पले।
मित्रवर क्षमा करना मुझको,
मैं संकट में भी काम न आया।
लौटा ज्यों ही लिए निराशा,
ललिता जी ने झट बुलवाया।
घनी विपति में कुछ धन देकर,
काम मित्र का चलवाया।
मित्र की पत्नी से धन पाकर,
मन ही मन वह हरषाया।
पूछा शास्त्री ने ललिता से,
रुपए कहाँ से ये आए?
आठ रुपए तुम देते हो जो,
उनसे ही हैं गये बचाए।
एक रुपए मैं हर इक महिने,
जैसे-तैसे बचाती हूँ।
सात रुपए में खींच-तान कर,
घर का खर्च चलाती हूँ।
शास्त्री जी ने उठ तुरंत,
कार्यालय को प्रस्थान किया।
एक रुपैया कटवा अपना,
वेतन रुपए सात किया।
गर्व भरी है कथा अनोखी,
देशप्रेम की, आन की।
गांधी-शास्त्री दोनों ही थे,
मूर्ति त्याग-बलिदान की।
रचयिता
पुष्पा जोशी 'प्राकाम्य',
सहायक अध्यापिका,
राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय,
शक्तिफार्म नंबर--5 ,
विकास खण्ड-सितारगंज,
जनपद-ऊधम सिंह नगर,
उत्तराखण्ड।
पाए दो अनमोल रतन।
लाल बहादुर शास्त्री जी,
और गांधी जी संग राम रटन।
सत्यवादिता, प्रेम, अहिंसा,
मेहनत और ईमान लगन।
इन दोनों के शस्त्र यही थे,
महकाया आजाद वतन।
देश की खातिर सुखों का अपने,
दोनों ने परित्याग किया।
देश की मिट्टी और कण-कण से,
दोनों ने अनुराग किया।
अंग्रेजों के जब विरुद्ध था,
बापू ने आह्वान किया।
प्रेम सहित बढ़-चढ़कर सबने,
अपना जीवन दान दिया।
देशभक्ति शास्त्री जी जैसी,
तुमने नहीं देखी होगी।
कथा सुनाऊँ तुमको उनकी,
सुनी नहीं तुमने होगी।
प्रधानमंत्री थे शास्त्री जब,
एक मित्र उनका आया।
पड़ा हुआ था संकट में,
पर कहने में कुछ सकुचाया।
माँगी उनसे अर्थ सहायता,
कुछ दिन का वादा करके।
शास्त्री जी ने किया निवेदन,
हाथ जोड़ दोनों अपने।
वेतन मैं उतना ही लेता,
जितने में है काम चले।
सबके ही ऐसा करने से,
औरों का भी पेट पले।
मित्रवर क्षमा करना मुझको,
मैं संकट में भी काम न आया।
लौटा ज्यों ही लिए निराशा,
ललिता जी ने झट बुलवाया।
घनी विपति में कुछ धन देकर,
काम मित्र का चलवाया।
मित्र की पत्नी से धन पाकर,
मन ही मन वह हरषाया।
पूछा शास्त्री ने ललिता से,
रुपए कहाँ से ये आए?
आठ रुपए तुम देते हो जो,
उनसे ही हैं गये बचाए।
एक रुपए मैं हर इक महिने,
जैसे-तैसे बचाती हूँ।
सात रुपए में खींच-तान कर,
घर का खर्च चलाती हूँ।
शास्त्री जी ने उठ तुरंत,
कार्यालय को प्रस्थान किया।
एक रुपैया कटवा अपना,
वेतन रुपए सात किया।
गर्व भरी है कथा अनोखी,
देशप्रेम की, आन की।
गांधी-शास्त्री दोनों ही थे,
मूर्ति त्याग-बलिदान की।
रचयिता
पुष्पा जोशी 'प्राकाम्य',
सहायक अध्यापिका,
राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय,
शक्तिफार्म नंबर--5 ,
विकास खण्ड-सितारगंज,
जनपद-ऊधम सिंह नगर,
उत्तराखण्ड।

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