बादल काका

उमड़ घुमड़ कर छायी घटाएँ
वर्षा आने वाली है
काली चादर तान घटाएँ
हमें डराने वाली हैं
सनन- सनन- सन चली हवाएँ,
चम-चम बिजली चमक रही
जाने कहाँ गिरेगी बिजली
किसे जलाने वाली है
चुन्नू, मुन्नू, रिंकी, बबली
घर से बाहर मत जाना
घर के अंदर खेलो-कूदो
आँगन में भी मत आना
जैसे पापा गुस्सा करते
हमको डाँट लगाते हैं
ऐसे ही ये बादल काका
सब पर रौब जमाते हैं
गरज-बरस जब थक जाएँगे
धूप सुहानी आएगी
गंदी सड़कें साफ- सुथरी होंगी
धरती भी खिल जाएगी
फिर हम सब बाहर खेलेंगे
मिलकर मौज मनाएँगे
बादल काका के जैसे ही
हम भी शोर मचाएँगे

रचयिता
शालिनी शर्मा,
सहायक अध्यापक,
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय छापुर,
विकास खण्ड-भगवानपुर,
जनपद-हरिद्वार,
उत्तराखण्ड।

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