हिन्दी परायी

अंग्रेजी हमने अपनी बनायी,
अपने ही घर में हिन्दी परायी।
करते नमस्ते न शीश नवाते
हाय- हैलो की रीति चलायी।
माँ न पिताजी,अम्मा न बापू,
मॉम और डैडी की रट है लगायी।
पूरी-कचौड़ी,लस्सी न शर्बत,
पिज्जा के संग में पेप्सी सुहायी।
पहिने न लुंगी,धोती न कुर्ता,
चुस्त पतलून है खूब सिलाई।
करते  न योगा, ध्यान न कसरत,
डिस्को पे अपनी कमर मटकाई।
बैठ सलीके से भोजन न करते,
खड़े-खड़े दावत भी हमने उड़ायी।
मनता जन्मदिन  लड्डू, न पेड़े,
होती अंग्रेजी धुन पर केक कटाई।
घर न सुहाया, कुनबा न भाया,
होते ही शादी अलग दुनिया बसायी।
दिल्ली भी छोड़ी, चेन्नई भी छोड़ी।
सिडनी कनाडा में कोठी बनायी।

रचयिता
राजबाला धैर्य,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय बिरिया नारायणपुर,
विकास खण्ड-क्यारा, 
जनपद-बरेली।

Comments

  1. अति सुन्दर हिंदी के प्रति भावात्मक अभिव्यक्ति को दर्शाती सोच

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