क्या चाहते हो युद्ध हो
मानती हूँ क्रुद्ध हो,
हृदय से भी शुद्ध हो!
किंतु एक क्षण रुको,
जरा विचार तो करो,
विवेक से प्रबुद्ध हो!
क्या चाहते हो युद्ध हो?
भले ही पंथ भिन्न हो,
इक दूसरे से खिन्न हो,
किंतु कष्ट तो समान है,
तेरे हाथ में कमान है!
उद्देश्य क्यूँ अवरुद्ध हो?
क्या चाहते हो युद्ध हो?
रिपु खड़ा प्रत्यक्ष है,
विनाश जिसका लक्ष्य है!
निर्णय तुम्हारा बंधुवर,
क्या द्वेष श्रेष्ठ है प्रेम पर?
यदि चाह लो तो बुद्ध हो!
क्या चाहते हो युद्ध हो?
संघर्ष ही तेरा कर्म है,
विजय ही मात्र धर्म है।
न विकल्प कोई शेष है,
यही समय विशेष है!
क्यूँ न मौन से अनिरुद्ध हो,
क्या चाहते हो युद्ध हो?
हृदय से भी शुद्ध हो!
किंतु एक क्षण रुको,
जरा विचार तो करो,
विवेक से प्रबुद्ध हो!
क्या चाहते हो युद्ध हो?
भले ही पंथ भिन्न हो,
इक दूसरे से खिन्न हो,
किंतु कष्ट तो समान है,
तेरे हाथ में कमान है!
उद्देश्य क्यूँ अवरुद्ध हो?
क्या चाहते हो युद्ध हो?
रिपु खड़ा प्रत्यक्ष है,
विनाश जिसका लक्ष्य है!
निर्णय तुम्हारा बंधुवर,
क्या द्वेष श्रेष्ठ है प्रेम पर?
यदि चाह लो तो बुद्ध हो!
क्या चाहते हो युद्ध हो?
संघर्ष ही तेरा कर्म है,
विजय ही मात्र धर्म है।
न विकल्प कोई शेष है,
यही समय विशेष है!
क्यूँ न मौन से अनिरुद्ध हो,
क्या चाहते हो युद्ध हो?
रचयिता,
अर्षिता सैनी,
सहायक अध्यापक,
अर्षिता सैनी,
सहायक अध्यापक,

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