नाव चली

कक्षा - 2
नाव चली

मेंढक,  चूहा,  चूजा,  चींटी,
और गुबरैला मित्र थे  पाँच।
एक दिन चूजा बोला सबसे,
चलो    घूमने     चलते   हैं।

सुना  बहुत है  सुन्दर दुनिया,
चलो    देखने     चलते    हैं।
आपस में फिर बातचीत कर,
चारों दुनिया  घूमने चल पड़े।

चलते-चलते  राह  में  आया,
फिर एक किनारा  झील का।
सबके   अब     ठहरे   कदम,
जाएँगे    हम     कैसे   आगे।

मेंढक बोला- मैं  तो  तैरकर,
झील   पार    कर   जाऊँगा।
रंग-बिरंगी    दुनिया    सारी,
घूम - घूम     के     आऊँगा।

चूहा,  चूजा,  चींटी,  गुबरैला,
बोले  हम  तो  तैर न  पाएँगे।
मेंढ़क  बोला  जो तैर न पाये,
तो सीधे अपने  घर को जाए।

कैसी  होती  है   यह  दुनिया,
बात फिर  तो भूल  ही जाएँ।

कहकर  मेंढक  इतना सबसे,
झटपट  झील  में  कूद  गया।
अपने  चारों   मित्रों   को  वो,
झील   किनारे    छोड़   गया।

चारों मित्र फिर  झील किनारे,
लगे   सोचने    कोई   उपाय।
ऐसी  राह  नजर  कोई  आए,
पार  झील  जिससे  हो जाए।

गया   अचानक,   दौड़कर  चूहा,
एक अखरोट का छिलका लाया।
और   फुदक-फुदक  कर  चूजा,
एक    बड़ा    सा   पत्ता   लाया।

चींटी  के   था   हाथ   में   आया,
नज़र    सरकंडा    बहुत    बड़ा।
गुबरैला    कुछ   देर   से   आया,
साथ   बड़ा   सा    धागा   लाया।

मिलकर  चारों  ने  बड़े  जतन से,
इक    सुंदर    सी    नाव   बनाई।
बनकर   नाविक  फिर   चूहे   ने,
सबको     झील    पार     कराई।

रचयिता
राजवीर सिंह 'तरंग',
प्रधानाध्यापक, 
प्राथमिक विद्यालय सिलहरी,
विकास क्षेत्र-सिलहरी, 
जनपद-बदायूँ।


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