मोर

रंग-बिरंगे पंखों वाले,
सबके दादा मोर हैं,
बारिश आती तभी बोलते,
नहीं मचाते शोर हैं।

       पिहू-पिहू आवाज़ लगाते,
       बादल उड़कर झट आ जाते,
       अपने पंखों को फैलाकर,
       हिला-हिला कर नाच दिखाते।

कीट पतंगे खा ख़ुश होते,
साँप को तो ये मार डालते,
पापा कहते दोस्त हमारे,
ये तो हैं हम सबके प्यारे।

         तभी तो हैं ये राष्ट्रीय पक्षी,
          हम सबके चितचोर हैं।।

रचयिता
सुधा,
जिला गाइड कैप्टन,
जनपद-गाजियाबाद।

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