सीख
ओ नन्हें बच्चे!
तुझे सिखाऊँ क्या?
मासूमियत! त्याग! मानवता?
या अवसर को भुनाना।
ओ प्यारे बच्चे!
तुझे समझाऊँ क्या?
न्याय! लोकतन्त्र! आजादी?
या दम्भ शासन चापलूसी।
ओ नन्हें फरिश्ते,
तुझे बनाऊँ क्या?
एक नि:स्वार्थ कर्मयोगी?
या अहं के मद में भोगी।
यहाँ लोभ है,
यहाँ स्वार्थ है,
ईर्ष्या है ,
दिखावा है,
हुनर है उपदेशकों का,
टकराव है रूतबे का;
खाई है अलगाव की,
मुखौटा है आडम्बर का।
बस सम्भल के निकलना,
इन कालिख भरी राहों से।
हार मत जाना कभी;
तू अपने ही जज्बातों से।
पहचान तू! अपने भीतर,
नैसर्गिक किरदार को;
आँखें खोल और जगा मन में;
इंसानियत के पहरेदार को।
देख! आगे सुन्दर बगीचा है,
जहाँ मानवता के पेड़ों पर,
खुशियाँ लदी हैं।
तुझे वहीं जाना है,
तेरी मंजिल वहीं है।
तुझे सिखाऊँ क्या?
मासूमियत! त्याग! मानवता?
या अवसर को भुनाना।
ओ प्यारे बच्चे!
तुझे समझाऊँ क्या?
न्याय! लोकतन्त्र! आजादी?
या दम्भ शासन चापलूसी।
ओ नन्हें फरिश्ते,
तुझे बनाऊँ क्या?
एक नि:स्वार्थ कर्मयोगी?
या अहं के मद में भोगी।
यहाँ लोभ है,
यहाँ स्वार्थ है,
ईर्ष्या है ,
दिखावा है,
हुनर है उपदेशकों का,
टकराव है रूतबे का;
खाई है अलगाव की,
मुखौटा है आडम्बर का।
बस सम्भल के निकलना,
इन कालिख भरी राहों से।
हार मत जाना कभी;
तू अपने ही जज्बातों से।
पहचान तू! अपने भीतर,
नैसर्गिक किरदार को;
आँखें खोल और जगा मन में;
इंसानियत के पहरेदार को।
देख! आगे सुन्दर बगीचा है,
जहाँ मानवता के पेड़ों पर,
खुशियाँ लदी हैं।
तुझे वहीं जाना है,
तेरी मंजिल वहीं है।
रचयिता
रमेश चंद्र जोशी(सत्यम जोशी),
सहायक अध्यापक,
रा0 प्रा0 वि0 बैकोट,
विकास खण्ड - धारचूला,
जनपद - पिथौरागढ़,
उत्तराखण्ड।

Beautiful lines💐
ReplyDeleteअति सुंदर👌👌👌
ReplyDeleteसुन्दर अभिव्यक्ति
ReplyDeleteA huge slaute to u for having
ReplyDeleteSuch a beautiful composition.
Nice lines.
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