शक्ति_दर्शन 10, मन की बात .........भारतीय संस्कृति की पोषक नारी
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मन की बात .........भारतीय संस्कृति की पोषक नारी*
भारतीय संस्कृति भारतीय समुदाय के जीवन-यापन की परम्परागत किंतु विकासोन्मुख शैली है। किसी भी देश की सामाजिक प्रथाएँ, व्यवहार, आचार-विचार, पर्व, त्योहार और सामुदायिक-जीवन का सम्पूर्ण ढांचा ही संस्कृति की नींव पर खड़ा रहता है और इस नींव की आधारशिला है भारतीय नारी; जिसने सदा ही अपने त्याग, सहिष्णुता, प्रेम, उदारता एवं सेवाभाव जैसे अद्वितीय गुणों को अपने अंदर समाहित करके इसका पोषण किया है।
निश्चित ही विश्व में सबसे पुरातन संस्कृतियों में एक है भारतीय संस्कृति, जिसकी दूसरी प्रमुख विशेषता इसकी निरंतरता है। निरंतरता बनाए रखने का दुरूह कार्य नारी शक्ति ने ही अपने कोमल स्कन्धोंं पर अनवरत लिया है। नारी के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना करना भी अकल्पनीय है।
भारतीय संस्कृति में ही भारतीय नारी की आत्मा बसी है। इसका सुंदर वर्णन जयशंकर प्रसाद ने अपनी रचना कामायनी में किया है-
तुम देवी कितनी उदार,
यह मातृभूमि है निर्विकार।
हे सर्वमंगले! तुम महती,
सबका दुख अपने पर सहती।।
भारतीय संस्कृति जो आज अपने गौरव पूर्ण इतिहास के लिए समूचे विश्व मे सुविख्यात है। इसकी मूल अवधारणा में नारी ही शक्तिस्वरूपा है। भारतीय नारी ने अपने निजी जीवन व सुख की चिंता किये बिना सदा ही त्याग और तपस्या को अंगीकृत करते हए भारतीय संस्कृति को पोषित किया है। भारतीय सनातन मूल्यों के संरक्षण व संवहन में नारी ने अतुलनीय योगदान दिया है, जिसको काव्य रूप में कुछ इस प्रकार शब्दित् किया गया है-
कौशल्या न होती तो राम कहाँ से होते ?
न होती देवकी तो कृष्ण को हम खोते ?
पथ बनाया जिन्होंने त्याग व तपस्या का
वो थी सीता, उर्मिला
अहिल्या व यशोधरा
जयवंता, जीजा जैसी कितनी
माताओं ने जीवित रखी संस्कृति की ज्योति
पद्मावती, नीरजा की द्युति कैसे कभी कम होगी
भारतीय संस्कृति सदा थी और रहेगी अमर,
समूचे जगत में
पोषण, रक्षण व संवहन जब सुरक्षित,
पल्लवित नारीत्व के आंचल में।
प्रियंका गुप्ता,स.अ.
संविलित विद्यालय गोयना, हापुड़
संकलन:-
टीम मिशन शिक्षण संवाद शक्ति परिवार
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