शिक्षा व साक्षरता

शिक्षा की शोहरत का सपना था।
जिद थी जिंदगी से कि कुछ करना था।
तमाशा बनकर रह गई अभिलाषा।
कुछ हद तक आंशिक ही बन पाई परिभाषा।
शिक्षा की बेचैनी का खुमार अब भी खामोश नहीं।
शिक्षा का बसंत खिलेगा आशा है यही।
शिक्षा रूपी लहर चलती है मेरे रगों में।
खिलेगी शिक्षा की बगिया बागों में।
मैं शिक्षा का चमन सँवारना चाहती हूँ।
यही समाज की सेवा में कुछ करना चाहती हूँ।
अखंड भारत की शिक्षा आती है कुछ याद।
इतिहास के पन्नों में लिपटकर हो गई अवसाद।
अबोध को बोध बनाना निशाना था।
एकमात्र शिक्षा को समाज में पिरोना था।
करना होगा फिर से कुछ प्रयास नया,
गढ़ना होगा शिक्षा का अध्याय नया।
आओ शिक्षा की इक नई लौ जलाएँ,
घर-घर में शिक्षा का शंखनाद बजाएँ।

रचयिता
सुनीता मैन्दोलिया,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय धीमरखेडा नवीन,
विकास खण्ड-काशीपुर,
जनपद-उधम सिंह नगर,
उत्तराखण्ड।

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