अध्यापक
माता -पिता, मित्र का संगम,
एक अध्यापक होता है।
पारिजात का बीज अक्षर,
वह बच्चे के मन में बोता है।
बच्चों का साथी बनकर,
बच्चा बन जाना होता है।
एक अध्यापक को बच्चों के,
मन से जुड़ जाना होता है।
पहला कदम विद्यालय की,
दहलीज पर रखता है बच्चा।
अपने माँ-पिता की ऊँगली को,
छोड़ कहाँ पाता बच्चा?
तब घुटनों के बल बैठकर,
अपना हाथ बढ़ाना होता है।
एक अध्यापक को बच्चों के,
मन से जुड़ जाना होता है।
जब उनको कहानी सुनानी हो,
या कविता पाठ कराना हो।
तब अध्यापक बचपन का अपने,
कालखण्ड दोहराता है।
कभी जोकर, कभी बन्दर बनकर,
सीख बताना होता है।
एक अध्यापक को बच्चों के,
मन से जुड़ जाना होता है।
किताबें बोझ नहीं होती हैं,
ये हैं तितली के पंखों सी।
कठिन सवाल गणित का हो
या कोई मुश्किल जीवन की।
उनके कोमल मन को सहलाकर,
हल बतलाना होता है।
एक अध्यापक को बच्चों के
मन से जुड़ जाना होता है ।
रचयिता
डॉ0 निधि लता सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय नइयापार खुर्द,
विकास खण्ड-पिपराइच,
जनपद-गोरखपुर।
एक अध्यापक होता है।
पारिजात का बीज अक्षर,
वह बच्चे के मन में बोता है।
बच्चों का साथी बनकर,
बच्चा बन जाना होता है।
एक अध्यापक को बच्चों के,
मन से जुड़ जाना होता है।
पहला कदम विद्यालय की,
दहलीज पर रखता है बच्चा।
अपने माँ-पिता की ऊँगली को,
छोड़ कहाँ पाता बच्चा?
तब घुटनों के बल बैठकर,
अपना हाथ बढ़ाना होता है।
एक अध्यापक को बच्चों के,
मन से जुड़ जाना होता है।
जब उनको कहानी सुनानी हो,
या कविता पाठ कराना हो।
तब अध्यापक बचपन का अपने,
कालखण्ड दोहराता है।
कभी जोकर, कभी बन्दर बनकर,
सीख बताना होता है।
एक अध्यापक को बच्चों के,
मन से जुड़ जाना होता है।
किताबें बोझ नहीं होती हैं,
ये हैं तितली के पंखों सी।
कठिन सवाल गणित का हो
या कोई मुश्किल जीवन की।
उनके कोमल मन को सहलाकर,
हल बतलाना होता है।
एक अध्यापक को बच्चों के
मन से जुड़ जाना होता है ।
रचयिता
डॉ0 निधि लता सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय नइयापार खुर्द,
विकास खण्ड-पिपराइच,
जनपद-गोरखपुर।

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