मेरी मातृभाषा
भाव से इक भाव उठता,
आज मेरे मन में ये।
हिन्द के हम हैं निवासी,
हिन्दी मेरी पहचान है।
संस्कृत है इसकी जननी,
ऋषि मुनियों की वाणी में।
प्रेम की बहती रसधारा,
मेरी मातृभाषा में।
अर्जुन के बाणों में है ये,
कृष्ण की गीता में है।
भीष्म की प्रतिज्ञा में है।
मेरी मातृ भाषा ये।
नदियों की कल-कल में है ये,
पक्षियों की कू-कू में है।
हवा के झोकों में बहती,
मेरी मातृभाषा ये।
हिन्दी में है चैतन्यता,
हिन्दी में है प्राणवायु।
कबीर सूर रसखान तुलसी,
मेरी मातृभाषा ये।
मातृ सम वंदनीय है ये,
पितृ सम पूजनीय है।
भातृ सम प्रेममय है,
मेरी मातृभाषा ये।
रचयिता
कृष्णा उपाध्याय,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय देवकरनपुर,
विकास क्षेत्र-जलेसर,
जनपद-एटा।
आज मेरे मन में ये।
हिन्द के हम हैं निवासी,
हिन्दी मेरी पहचान है।
संस्कृत है इसकी जननी,
ऋषि मुनियों की वाणी में।
प्रेम की बहती रसधारा,
मेरी मातृभाषा में।
अर्जुन के बाणों में है ये,
कृष्ण की गीता में है।
भीष्म की प्रतिज्ञा में है।
मेरी मातृ भाषा ये।
नदियों की कल-कल में है ये,
पक्षियों की कू-कू में है।
हवा के झोकों में बहती,
मेरी मातृभाषा ये।
हिन्दी में है चैतन्यता,
हिन्दी में है प्राणवायु।
कबीर सूर रसखान तुलसी,
मेरी मातृभाषा ये।
मातृ सम वंदनीय है ये,
पितृ सम पूजनीय है।
भातृ सम प्रेममय है,
मेरी मातृभाषा ये।
रचयिता
कृष्णा उपाध्याय,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय देवकरनपुर,
विकास क्षेत्र-जलेसर,
जनपद-एटा।

Sunder kavita
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